भागीरथपुरा में 23 मौतें, प्रशासन ने 21 ही स्वीकारी: चिकित्सकों ने डायरिया को वजह बताकर कलेक्टर को सौंपी रिपोर्ट
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भागीरथपुरा में ड्रेनेजयुक्त पानी से 23 लोगों की मौत हो चुकी है। सैकड़ों अस्पताल में हैं। इस बीच चिकित्सकों ने अपनी जांच रिपोर्ट कलेक्टर को सौपी है। इसमें माना है अधिकतर मौतें डायरिया से हुई है। इस रिपोर्ट के बाद प्रशासन ने 21 मौतें ही स्वीकारी हैं।
भागीरथपुरा में मौतें लगातार हो रही हैं। इस बीच चिकित्सकों ने डेथ ऑडिट कर रिपोर्ट प्रशासन को सौंप दी है। इसमें 6 मौत सीधे डायरिया से होना बताया है, वहीं नौ मौतों का संभावित कारण भी डायरिया ही बताया है। डेथ ऑडिट में दो मौतों का कारण स्पष्ट नहीं है, वहीं चार मौतों का संबंध पेयजल त्रासदी से नहीं होना बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक ये मौतें अन्य कारणों से हुई हैं। कलेक्टर शिवम वर्मा ने 21 मौतों का डेथ ऑडिट पूरा होने की पुष्टि की है।
50 टीमें कर रहीं सर्वे: सीएमएचओ डॉ. माधवप्रसाद हासानी ने बताया भागीरथपुरा में 50 टीमों द्वारा सर्वे किया जा रहा है। इसके अंतर्गत भागीरथपुरा ओपीडी में 12 नए मरीज डायरिया के आए, जिनमें से तीन को रैफर किया गया है। क्षेत्र के निवासियों को हेल्थकार्ड वितरित किए गए हैं, जिसमें उनके स्वास्थ्य सूचकांक की जानकारी है। आशा कार्यकर्ता लोगों को भयमुक्त रहने के बारे में समझाईश दे रही हैं।
हैजा व डायरिया: भागीरथपुरा में हैजा और डायरिया जैसी संक्रामक बीमारी फैल गई है। मौत का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। हालांकि, प्रशासन, निगम व स्वास्थ्य विभाग पूरी ताकत से हालात को नियंत्रित करने के प्रयास कर रहा है लेकिन अब तक मरीजों का मिलना जारी है। लोगों का कहना है सब कुछ ठीक नहीं कहा जा सकता।
कागजी दावों के बीच गहराता मौत का साया
भागीरथपुरा का स्वास्थ्य संकट भयावह त्रासदी का रूप ले रहा है, जहां प्रशासन के तमाम दावों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक ओर सरकारी तंत्र 50 दलों के माध्यम से घर-घर जांच का रिपोर्ट कार्ड पेश कर रहा है, दूसरी ओर मरने वालों का बढ़ता आंकड़ा अभियान को कटघरे में खड़ा कर रहा है।
सोमवार को 50 सर्वे दलों ने 1,657 घरों में 4,827 लोगों के परीक्षण का दावा किया, लेकिन बढ़ती मौतों ने चिंता में डाल रखा है। सीएमएचओ डॉ. माधवप्रसाद हासानी ने बताया सोमवार को ओपीडी में डायरिया के 12 नए मामले आए, जिनमें से तीन को गंभीर स्थिति में अस्पतालों में रैफर किया गया है।
प्रशासन द्वारा वितरित किए जा रहे हेल्थ कार्ड और आशा कार्यकर्ताओं की समझाइश के बीच बड़ा सवाल है तंत्र इतना सक्रिय है तो मृत्यु दर में कमी क्यों नहीं आ रही? कलेक्टर शिवम वर्मा के निर्देश पर क्षेत्र में तीन एंबुलेंस और 24 घंटे चिकित्सक तैनात हैं साथ ही मरीजों को एमवाय, अरबिंदो और चाचा नेहरू भेजने की व्यवस्था भी कागजों पर दुरुस्त है, लेकिन धरातल पर लाशें व्यवस्थाओं का खुलासा कर रही हैं।
डॉ. हासानी ने निजी अस्पतालों को निःशुल्क उपचार के निर्देश तो दिए हैं पर पीड़ितों का आक्रोश यह बताने के लिए काफी है कि राहत के नाम पर औपचारिकता से ज्यादा कुछ नहीं है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं भर्ती मरीजों की संख्या घटकर 39 रह गई है और आईसीयू में केवल 10 मरीज हैं, लेकिन मौत के बढ़ते ग्राफ ने पूरे इंदौर को चिंता में डाल दिया है।
‘प्रत्येक घर पहुंचेगा जल, जब खिलेगा कमल’
सोशल मीडिया पर भागीरथपुरा का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने सत्ता के चुनावी जुमलों को नंगा कर दिया है। वीडियो में एक बोर्ड साफ नजर आता है, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा है ‘प्रत्येक घर पहुंचेगा जल, जब खिलेगा कमल।’
यह लाइन अब नारे से ज्यादा एक कड़वा व्यंग्य बन चुकी है। जिस इलाके में दूषित पानी से 23 लोगों की जान चली गई, वहां यह बोर्ड सरकार की नाकामी और झूठे वादों का सबसे बड़ा सबूत बनकर खड़ा है।
चुनाव के वक्त जिस भरोसे के साथ यह नारा उछाला गया था, वही भरोसा आज लोगों के लिए मातम और आक्रोश में बदल चुका है। यह कोई साधारण नारा नहीं, बल्कि उस राजनीतिक खोखलेपन का आईना है, जिसने भागीरथपुरा को मौत के मुहाने पर ला खड़ा किया।
जिस इलाके में अब तक 23 लोगों की जान दूषित पानी के कारण जा चुकी है, वहां सरकार पूरी तरह बैकफुट पर नजर आ रही है। पार्षद से लेकर क्षेत्रीय विधायक तक चुप्पी साधे बैठे हैं, मानो यह त्रासदी उनकी जिम्मेदारी ही न हो।
इलाके में कभी गाड़ियों के काफिलों के साथ दौड़ने वाले नेताओं की चमचमाती गाड़ियां अब कभी-कभार बंद कांच के भीतर से ही भागीरथपुरा की गलियों से गुजरती दिख जाती हैं। लेकिन किसी नेता में इतनी हिम्मत नहीं बची कि वह उतरकर पीड़ित परिवारों की आंखों में आंख डालकर बात कर सके। लोगों का गुस्सा, उनकी बेबसी और मौतों की चीखें अब सत्ता के कानों तक पहुंचने लायक भी नहीं मानी जा रही हैं।
कहीं दूसरा ‘भागीरथपुरा’ न बन जाए ‘आंबाचंदन’!
महू के पास दूषित पानी पीने को मजबूर ग्रामीण
भागीरथपुरा के बाद भी प्रशासन ने सबक नहीं लिया है। वही हालात महू क्षेत्र के आंबाचंदन गांव में नजर आ रहे हैं। यहां के ग्रामीण वर्षों से जहरीला और संदिग्ध पानी पीने को मजबूर हैं, लेकिन शासन-प्रशासन खामोश है। ग्रामीणों को डर है समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो आंबाचंदन भी एक दिन भागीरथपुरा की तरह मौतों का नया अध्याय बन सकता है।
ग्रामीणों का आरोप है गांव में राजनीति का ऐसा जाल बिछा है, जिसमें आम आदमी की आवाज दब जाती है। छोटे-छोटे नेताओं को बड़े नेताओं का संरक्षण है, जिसके कारण रहवासी अपनी पीड़ा तक खुलकर नहीं कह पाते। वर्षों से इस व्यवस्था का खामियाजा भुगत रहे हैं।
कोई भी डर के कारण शिकायत करने आगे नहीं आता क्योंकि पता है सुनवाई कहीं नहीं होगी। अब ग्रामीणों को सिर्फ खुलासा फर्स्ट से उम्मीद है कि उसके माध्यम से उनकी आवाज सरकार तक पहुंचेगी और शायद प्रशासन जागेगा। आंबाचंदन के पाटीदार मोहल्ले में आंगनवाड़ी परिसर में सार्वजनिक बोरिंग है, जिससे पूरे गांव को पानी सप्लाई होता है।
गांव में करीब 2200 घर हैं और इसी एक बोरिंग से हजारों लोग रोज पानी पीते हैं। ग्रामीणों का आरोप है इस बोरिंग की जमीन पर सचिन पाटीदार ने कब्जा कर रखा है और वहां अपने जानवरों का मल-मूत्र डलवा रहा है, जिससे पानी की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। पंचायत और प्रशासन आंख मूंदे बैठे हैं।
अतिक्रमणकारी को भाजपा का संरक्षण
ग्रामीणों का कहना है सचिन को भाजपा नेताओं का संरक्षण है। इस कारण कोई भी अवैध कब्जे और गंदगी के खिलाफ आवाज नहीं उठा पा रहा। शिकायत करने का मतलब पूरे पंचायत तंत्र को दुश्मन बना लेना है। कुछ लोगों ने मुद्दा उठाने की कोशिश की थी, लेकिन रंगदारी के जरिए आवाज दबा दी गई।
रहवासियों के अनुसार बोरिंग के आसपास खुला प्लॉट था, उस पर धीरे-धीरे कब्जा जमाया गया और आज निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। आशंका है यहां भी दूषित पानी से मौतों का तांडव शुरू हो सकता है। आंबाचंदन के लोग वही पूछ रहे हैं जो कभी भागीरथपुरा ने पूछा था?
क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा? फिर जांच और बयानबाजी होगी? अगर आज भी शासन-प्रशासन नहीं चेता, तो आंबा चंदन भी कल भागीरथपुरा की तरह सरकारी लापरवाही का दूसरा नाम बन जाएगा।
खुलासा फर्स्ट से उम्मीद वो हमारी आवाज बने: शहर से सटे आंबा चंदन गांव के रहवासी आज दूषित और जहरीला पानी पीने को मजबूर हैं, लेकिन शासन-प्रशासन मानो यहां भी किसी नए भागीरथपुरा कांड का इंतजार कर रहा है।
गांव में राजनीति का ऐसा जाल बिछा है कि बड़े नेताओं ने छोटे-छोटे गांव के नेताओं को अपने संरक्षण में ले रखा है और इसी की कीमत वर्षों से आम ग्रामीण चुका रहे हैं। डर, दबाव और नेतागिरी के कारण कोई भी व्यक्ति अपनी आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा।
जो बोलने की कोशिश करता है, उसे राजनीतिक छर्रों से कुचल दिया जाता है। इस सन्नाटे और बेबसी के बीच ग्रामीणों को अब सिर्फ खुलासा फर्स्ट से उम्मीद है कि उनकी आवाज सरकार तक पहुंचेगी, प्रशासन की नींद टूटेगी और शायद पहली बार इन गांव के रहवासियों को भी इंसान समझकर सुना जाएगा।
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