राणा को क्या देंगे जवाब: अरावली न होगा तो न पन्ना धाय होगी; न महाराणा प्रताप
बचेगी अरावली पर्वतमाला ? धरोहर बचाने का संघर्ष देशभर में और तेज हुआ मोदी सरकार का दावा- पूरी अरावली पर्वतमाला संरक्षित व सुरक्षित है, भ्रम न फैलाएं, सिर्फ तकनीकी परिभाषा हुई तय नितिन मोहन शर्मा...
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संवाददाता

बचेगी अरावली पर्वतमाला ?
धरोहर बचाने का संघर्ष देशभर में और तेज हुआ
मोदी सरकार का दावा- पूरी अरावली पर्वतमाला संरक्षित व सुरक्षित है, भ्रम न फैलाएं, सिर्फ तकनीकी परिभाषा हुई तय
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
ये सारे सवाल अरावली पर्वतमाला पर आए अकस्मात संकट के साथ एकाएक सामने आ गए। अरावली पर ये संकट कोई ताजा नहीं, लेकिन इस बार ये संकट भयावह इसलिए प्रतीत हो रहा है कि इस बार परिभाषा उस कोर्ट ने तय की है, जिसे सुप्रीम माना जाता है। यानी इससे ऊपर कोई न्याय की आवाज नहीं।
डर बस ये ही सताया है कि जब सुप्रीम व्यवस्था की न्याय के लिए ऐसी परिभाषा गढ़ दे, जो पहली नजर में अन्याय महसूस हो, तो फिर पीड़ित पक्ष कहां से दया-न्याय की आस करेगा? ईश्वर करें कि न्याय की ताजा सुप्रीम परिभाषा वैसी ही साबित हो, जैसी देश की सरकार बता व जंचा रही है कि ये फैसला नहीं, अरावली पर्वतमाला के उपयोग की एक परिभाषा मात्र है।
यानी सिर्फ ये दिशानिर्देश हैं कि भविष्य में इस ऐतिहासिक पर्वत का ‘सदुपयोग' कैसे व किन परिस्थितियों में हो। मोदी सरकार इस पूरे मामले को भ्रमित करने वाला बता रही है कि कोर्ट की परिभाषा तो पहाड़ को बचाने के लिए है, न कि खनन की अनुमति देने के लिए।
जो भी हो, लेकिन ये सुकून की बात है कि अरावली पर आए संकट के खिलाफ देशभर में जनजागरण हुआ है। धरोहर बचाने के लिए समूचे देश में एक बड़ी बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया पर तो अरावली बचाने की लड़ाई चरम पर आ गई है और ये देश की सरहदें भी लांघ गई है। राजस्थान में तो जनसामान्य सड़कों पर उतर आया है।
जयपुर, उदयपुर सहित कई जिलों में प्रदर्शन, रैली, धरने हो रहे हैं। प्रतिपक्ष कांग्रेस भी दलबल के साथ मैदान में आ गई है। राज्य के कई हिस्सों में प्रदर्शनकारियों की पुलिस के साथ झड़प भी हुई। सत्तारूढ़ दल भाजपा व विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी शुरू हो गया है कि किसके राज्य में अरावली का शोषण व दोहन हुआ।
मोदी सरकार में वन व पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र सिंह ने दावा किया है कि 100 मीटर की ऊंचाई का आधार जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने तय किया है। संस्था के प्रतिनिधि कोर्ट की उस टेक्निकल कमेटी में थे, जिसने अरावली की नई परिभाषा तय की है। नई परिभाषा केवल खनन के क्षेत्र में ही लागू होगी, जो अरावली पर्वतमाला के कुल क्षेत्र का महज एक प्रतिशत हिस्सा भी नहीं है।
इस नई परिभाषा से पारदर्शिता के सुनिश्चित होने का दावा भी केंद्रीय मंत्री यादव ने किया और कहा कि मैनेजमेंट प्लान फॉर सस्टेनेबल माइनिंग के तैयार होने तक नए खनन पट्टे को मंजूरी नहीं दी जाएगी।
सामरिक दृष्टि से भी देश की सुरक्षा में निभाई भूमिका... अरावली की पहाड़ियों जैसी अन्य सभी पहाड़ियां सामरिक दृष्टि से भारतवर्ष की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आई हैं। महाराणा प्रताप, शिवाजी एवं छत्रसाल जैसे राष्ट्रनायकों ने विदेशी आक्रांताओं से इन्हीं पहाड़ियों का आश्रय लेकर युद्ध किया था।
इन सभी राष्ट्रनायकों को अपराजेय बनाए रखने में अरावली जैसी पहाड़ियों की भी मुख्य भूमिका रही है। अरावली के पहाड़ों की सबसे बड़ी विशेषता है उनकी संधियां। अरावली को आडावली, आडा अवली यूं ही नहीं कहा जाता। ये पेयजल की सबसे बड़ी स्रोत हैं। ऊंचाई में कम भी हो, लेकिन वे आपस में गुंथी हैं और उनमें जल-धाराएं ऊपरी ही नहीं, आंतरिक शिराओं के रूप में भी बहती हैं।
महाराणा प्रताप के काल (1576 ई.) में जब इन पहाड़ियों का सर्वे हुआ, तब पहाड़ियों, वनस्पतियों, प्राणियों और मिट्टियों के आधार पर अनेक विशेषताएं लिखीं। यह भी कहा कि अकाल से बचाव का सबसे बड़ा उपाय इन पहाड़ियों में जलस्रोत निर्माण है।
महाराणा राज सिंह (1660 ई.) के काल में फिर से अरावली की नदियों का अध्ययन हुआ। तब ये कहा गया कि ये पहाड़ियां सामान्य नदी और नाले ही नहीं, नद जैसे महाजलस्रोत पैदा करने वाली अचल रेखाएं हैं। ये जल ही नहीं, जीवन की जाग्रत देव हैं।
अरावली में पग-पग पर इतिहास, महाभारत से लेकर स्वाधीन भारत के संघर्ष का साक्षी
क्या जवाब देंगे हम राणा कुंभा को? मुंह दिखा पाएंगे हम उस पन्नाधाय को, जिसने मेवाड़ को भारत का भाल, शूरवीर महाराणा प्रताप दिया? महाराणा प्रताप ने क्या इन्हीं दिनों के लिए इसी पर्वतीय क्षेत्र में घास की रोटी खाकर देश-धर्म और स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी?
कुंभलगढ़ किले का जग-प्रसिद्ध गौरव क्या फिर आंख उठाकर हम किसी को बखान पाएंगे? उदयपुर की मोती मगरी की ऊंचाई से फिर हम क्या निहारेंगे? क्या झीलों की नगरी को हम ‘उत्तर का कश्मीर' कह पाएंगे? उस चेतक को क्या जवाब देंगे, जो रण क्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हो गया था?
हल्दीघाटी में समाए ‘शोणित' के कतरे हमें धिक्कारेंगे नहीं? मेवाड़ के उन रणबांकुरों की क्या गति होगी, जो मुगलों के खिलाफ जब-तब लड़ते रहे। इसी घाटी में ही तो ‘मुंड कट गए धड़ लड़ते रहे' जैसा असंभव-सा शौर्य रचा गया था।
आबू की ऊंचाई का क्या होगा और अलवर किस गति को प्राप्त करेगा? ‘इंद्रप्रस्थ' की रक्षा फिर कौन करेगा? कौन हिमालय की वादियों तक रेत के कण की दस्तक रोकेगा?
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