‘पटेल परिवार’ की पकड़ ढीली: जमीनी नेता की दस्तक बरकरार; देपालपुर की सियासत में उबाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
देपालपुर विधानसभा की राजनीति निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। वर्षों कांग्रेस की राजनीति में प्रभाव रखने वाला पटेल परिवार उसी ज़मीन पर अपनी पकड़ बचाने के लिए संघर्ष करता नजर आ रहा है, जहां कभी उसकी तूती बोलती थी।
हाल ही में हुई ब्लॉक स्तरीय बैठक में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की मौजूदगी में जिस तरह मंच से ही राधेश्याम पटेल ने ‘चार नंबर से चुनाव लड़ने’ की घोषणा के साथ शर्तों का पिटारा खोल दिया, उसने यह साफ संकेत दे दिया कि अब राजनीति केवल दावेदारी नहीं, बल्कि सौदेबाज़ी की ओर बढ़ रही है।
सवाल यह है कि क्या कांग्रेस जैसी पार्टी अब इस तरह की शर्तों पर टिकट बांटेगी, खासकर तब जब शीर्ष नेतृत्व ‘टीम प्लेयर’ की कसौटी पर नेताओं को परखने की बात कर रहा है?
इतिहास की परछाइयां और वर्तमान की हकीकत
देपालपुर की सियासत में पटेल परिवार का इतिहास लंबा जरूर रहा है, लेकिन हालिया रिकॉर्ड कहीं न कहीं उनकी दावेदारी पर सवालिया निशान खड़ा करता है। स्वर्गीय रामेश्वर पटेल (बाबू जी) से लेकर सत्यनारायण पटेल तक, चुनावी मैदान में मौके तो भरपूर मिले—लेकिन जीत कम और हार ज्यादा दर्ज हुई।
हार की हैट्रिक और भरोसे का संकट
सत्यनारायण पटेल की बात करें तो 2008 के बाद से जीत का सूखा खत्म नहीं हुआ है। विधानसभा हो या लोकसभा, हर चुनाव में पराजय का सिलसिला जारी रहा। ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है—क्या कांग्रेस पार्टी फिर से उसी चेहरे पर दांव लगाएगी, जिसे जनता बार-बार नकार चुकी है? और यही वह बिंदु है जहां पार्टी नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी की “परफॉर्मेंस आधारित राजनीति” की बात, सीधे तौर पर लागू होती नजर आती है।
विरोध की राजनीति या आत्मघाती कदम?
राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जब विरोध सड़कों पर पुतला दहन और दिल्ली दरबार तक शिकायतों के रूप में पहुंच जाए, तो वह संगठन के लिए चेतावनी बन जाता है। जीतू पटवारी और जिला अध्यक्ष के खिलाफ खुले मंच से आरोप लगाना—क्या यह अनुशासनहीनता नहीं? और क्या ऐसे नेता पर पार्टी दोबारा भरोसा करेगी?
इसी बीच, देपालपुर की राजनीति में एक नाम तेजी से उभर रहा है—मोती सिंह पटेल। जो दशकों से लगातार क्षेत्र में सक्रिय, किसान नेता के रूप में मजबूत पहचान और जनपद पंचायत से लेकर दुग्ध संघ तक लगातार जीत का रिकॉर्ड—यह कोई संयोग नहीं, बल्कि जमीनी पकड़ का प्रमाण है।
जहां एक ओर बड़े नामों की राजनीति “टिकट की शर्तों” में उलझी है, वहीं मोतीसिंह पटेल का मॉडल बिल्कुल अलग है— “सरलता, उपलब्धता और सतत सक्रियता” यही वह तीन स्तंभ हैं, जिन पर आज की राजनीति खड़ी हो रही है।
कांग्रेस के लिए बड़ा फैसला
मध्य प्रदेश में 2028 की सत्ता वापसी के लक्ष्य के साथ कांग्रेस अब प्रयोग नहीं, परिणाम चाहती है। ऐसे में पार्टी के सामने स्पष्ट विकल्प है। या तो पुराने चेहरों के साथ जोखिम उठाया जाए या फिर जमीनी नेताओं को मौका देकर नई ऊर्जा भरी जाए।
तीखा सवाल, साफ संदेश: देपालपुर की जनता अब यह तय कर चुकी है कि ‘पैराशूट नेता’ नहीं, ‘पैदल चलने वाला नेता’ चाहिए, जो खेत-खलिहान की भाषा समझे, जो हर सुख-दु:ख में साथ खड़ा रहे। और शायद यही कारण है कि इस बार समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं।
अगर कांग्रेस ने इस बार भी ज़मीनी हकीकत को नजरअंदाज किया, तो यह केवल एक सीट का नुकसान नहीं होगा, बल्कि यह संदेश जाएगा कि पार्टी अभी भी ‘जमीनी राजनीति’ से दूर है।
देपालपुर की सियासत साफ कह रही है ‘अब वक्त नाम नहीं, काम का है… और मैदान उसी का होगा, जो जमीन से जुड़ा होगा।’
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