विस्मृति के भंवर में व्यासचट्टी: जहां कभी ऋषियों ने रचे थे शास्त्र; आज वहां पसरा है सन्नाटा
KHULASA FIRST
संवाददाता

हिमालय का उपेक्षित अध्याय, आधुनिकता की भेंट चढ़ता ‘व्यास-तीर्थ’ और लुप्त होती पैदल यात्रा संस्कृति
जहां गंगा रचती है ‘ऊं’ की आकृति, मशीनों के शोर में कहीं खो गया शास्त्रों की जन्मभूमि का सन्नाटा
पगडंडियों से हेलीकॉप्टर तक सुगम हुई बद्रीनाथ की राह, पर विस्मृति के गर्त में समा गए पौराणिक पड़ाव
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
हिमालय की गोद में बद्रीनाथ की ओर बढ़ते हुए आज की पीढ़ी को केवल मशीनों की गूंज और ‘ऑल वेदर रोड’ की चकाचौंध दिखाई देती है, लेकिन, गहरी खाइयों और आधुनिक राजमार्गों के नीचे वह ‘आध्यात्मिक पथ’ दम तोड़ रहा है, जिस पर कभी आदि गुरु शंकराचार्य और स्वयं महर्षि वेदव्यास के चरण पड़े थे।
इस प्राचीन मार्ग का सबसे जादुई और महत्वपूर्ण पड़ाव था - व्यासचट्टी। आज की हेलीकॉप्टर संस्कृति ने गंतव्य की दूरी तो घटा दी, लेकिन उस पौराणिक यात्रा के अनुभव को हमसे छीन लिया है, जहां कदम-कदम पर इतिहास और अध्यात्म जीवंत था।
स्कंद पुराण का साक्ष्य- ‘व्यास-तीर्थ’ की खोई हुई महिमा...स्कंद पुराण के ‘केदारखंड’ में ऋषिकेश से बद्रीनाथ के इस पैदल मार्ग का वर्णन केवल एक रास्ते के रूप में नहीं, बल्कि एक मोक्ष-मार्ग के रूप में मिलता है।
गंगा और नयार नदी (प्राचीन नवलिका या नारद गंगा) के पावन संगम पर स्थित यह क्षेत्र महर्षि वेदव्यास की प्रधान साधना स्थली रहा है। केदारखंड में उल्लेख है कि महर्षि व्यास ने बद्रीनाथ की अपनी अंतिम यात्रा से पूर्व यहां रुककर गंगा की स्तुति की थी।
इस स्थान को ‘व्यास-तीर्थ’ के नाम से संबोधित किया गया है। पुराणों के अनुसार, इस क्षेत्र में स्नान और दान करने से वही अक्षय पुण्य प्राप्त होता है जो सरस्वती और अलकनंदा के संगम पर मिलता है। विडंबना यह है कि आज का यात्री इस तीर्थ के ऊपर से कंक्रीट के पुलों से गुजर जाता है, लेकिन इसकी दिव्यता से अनभिज्ञ रहता है।
शास्त्रों के मंथन की ‘पूर्व-पीठिका’... इतिहासकार और आध्यात्मिक गुरु मानते हैं कि यद्यपि महर्षि व्यास ने महाभारत का अंतिम लेखन बद्रीनाथ की ‘व्यास गुफा’ में किया, लेकिन वेदों के विभाजन और पुराणों की रूपरेखा का वैचारिक मंथन इसी ‘व्यासचट्टी’ की भूमि पर हुआ था।
‘चट्टी’ शब्द आधुनिक काल में विश्राम स्थलों के लिए रूढ़ हुआ, लेकिन ‘व्यास’ नाम उस कालजयी घटना का प्रतीक है जब महर्षि ने यहाँ एक विशाल शिला पर बैठकर अपने शिष्यों को ज्ञान की दीक्षा दी थी। इसे बद्रीनाथ का वास्तविक प्रवेश द्वार माना जाता था।
आध्यात्मिक भूगोल- ‘ऊं’ की आकृति में बहती गंगा... हालिया भौगोलिक शोध और पौराणिक भूगोल के मेल से एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आता है। ऋषिकेश और व्यासचट्टी के बीच गंगा की धारा प्राकृतिक रूप से ‘ऊं’ की आकृति बनाती है।
स्कंद पुराण में इस क्षेत्र को ‘दिव्य’ कहा गया है क्योंकि यहां गंगा का प्रवाह ऋषियों की तपस्या के कारण अत्यंत शांत और ध्यान-योग्य हो जाता है। व्यासचट्टी इसी ‘ऊं’ आकृति के एक निर्णायक मोड़ पर स्थित है, जो इसे और भी रहस्यमयी बनाता है।
सांस्कृतिक विरासत का अंत- चट्टियों के साथ उजड़ा संवाद...पुराने पैदल मार्ग पर ‘चट्टी’ केवल एक सराय नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता को एक सूत्र में पिरोने वाला केंद्र थी। व्यास चट्टी, लक्ष्मण चट्टी और महादेव चट्टी जैसे स्थलों पर दक्षिण भारत का यात्री उत्तर भारत के लोक गीतों और परंपराओं से परिचित होता था।
एक ही चूल्हे पर पकता भोजन और साझा अनुभव ‘अनेकता में एकता’ का जीवंत प्रमाण थे। इन चट्टियों पर रात के समय तीर्थयात्री और स्थानीय पंडित पौराणिक कथाएं सुनाते थे। यात्री बंद गाड़ियों में सीधे धाम पहुंचते हैं, तो वे उन हजारों सूक्ष्म लोक-कथाओं और अनुभवों से वंचित रह जाते हैं जो इस यात्रा का असली ‘प्रसाद’ थे।
विकास की वेदी पर बलि चढ़ती विरासत... आज की ‘ऑल वेदर रोड’ ने समय तो आधा कर दिया, लेकिन उन प्राचीन जल स्रोतों (धारों), लघु मंदिरों और विश्राम स्थलों को मलबे के नीचे दबा दिया जो इस मार्ग की आत्मा थे।
महज 15 मिनट की हवाई यात्रा ने उस ‘तप’ और ‘साधना’ के भाव को गौण कर दिया है जो 15 दिनों की पैदल यात्रा में प्राप्त होता था। आज की यात्रा में सुविधा तो है, लेकिन श्रद्धा का वह कठिन मार्ग गायब है।
व्यासचट्टी के पास से गुजरने वाली पुरानी पगडंडियां अब झाड़ियों और मलबे से पटी पड़ी हैं। यहां की नीरवता अब शांति की नहीं, बल्कि आधुनिक समाज की उपेक्षा की गवाही दे रही है।
क्या हम अपनी जड़ों को फिर से ढूंढ पाएंगे?... बद्रीनाथ और केदारनाथ केवल मंदिर नहीं, बल्कि एक जीवंत ‘यात्रा संस्कृति’ के शिखर हैं।
यदि हम व्यासचट्टी जैसे पौराणिक स्थलों को विस्मृति के गर्त में जाने देंगे, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जिसके पास धर्म की जानकारी तो होगी, लेकिन उसका आत्मिक बोध नहीं होगा।
लोगों का कहना है कि इन प्राचीन पैदल मार्गों की ‘हेरिटेज मैपिंग’ करनी चाहिए। इन्हें ‘पौराणिक सर्किट’ के रूप में पुनर्जीवित करना समय की मांग है।
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