सृजन की पहली किरण: विक्रम संवत 2083 और आत्म-बोध की चैत्र नवरात्रि
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय, खुलासा फर्स्ट।
कालगणना का चक्र जब चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को स्पर्श करता है, तो यह केवल पंचांग के पन्नों का पलटना नहीं, बल्कि संपूर्ण चराचर जगत के पुनर्जीवन की एक दिव्य उद्घोषणा होती है। इस वर्ष 19 मार्च ( गुरुवार ) के पावन दिन से 'गुड़ी पड़वा' के साथ हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2083 का अभिनंदन होगा और इसी तिथि से श्रद्धा व शक्ति के महापर्व 'चैत्र नवरात्रि' का शुभारंभ भी होगा।
'रौद्र' नामक संवत्सर का आगमन होगा
'रौद्र' नामक इस संवत्सर का आगमन हमारे द्वार पर 'सृजन की पहली किरण' बनकर खड़ा है। यह वह संधि काल है, जहाँ प्रकृति अपने पुराने पत्तों का त्याग कर नव-पल्लवों से श्रृंगार करती है । मानवीय चेतना अपनी जड़ों की ओर लौटकर आत्म-निरीक्षण का संकल्प लेती है। यह प्रकृति, अध्यात्म और मानवीय चेतना के पुनर्जागरण का पर्व है।हिंदू नववर्ष की यह पावन बेला हमें केवल उत्सवों के बाहरी शोर तक सीमित नहीं रखती, बल्कि 'आत्म-बोध' के उस एकांत मार्ग पर ले जाती है, जहाँ धर्म, विज्ञान और मानवीय मूल्यों का विलक्षण संगम होता है।
आंतरिक शक्ति और सामाजिक मर्यादाओं के बीच संतुलन की सबसे अधिक आवश्यकता
इस संवत्सर का उदय एक ऐसे समय में हो रहा है, जब मनुष्य को अपनी आंतरिक शक्ति और सामाजिक मर्यादाओं के बीच संतुलन की सबसे अधिक आवश्यकता है। चैत्र नवरात्रि की प्रतिपदा पर घटस्थापना और गुड़ी पड़वा पर विजय पताका का फहराया जाना शक्ति और संयम के उस भारतीय दर्शन को रेखांकित करता है जो सिखाता है कि बिना आत्म-शुद्धि के कोई भी नई शुरुआत अधूरी है।
नीम की कड़वाहट से यथार्थ को स्वीकारने का साहस
पंडितों और ज्योतिषियों के अनुसार यह उस वैचारिक यात्रा का आरंभ है, जो हमें गुड़ी की ऊँचाई से जीवन के उच्च लक्ष्यों और नीम की कड़वाहट से यथार्थ को स्वीकारने का साहस देती है। जानकारों का कहना है कि कलश स्थापना के इस पुण्य अवसर के दिन हम केवल देवताओं का ही नहीं, बल्कि अपने भीतर की सुप्त ऊर्जा और उन मानवीय मूल्यों का भी आह्वान करें, जो इस नव संवत्सर को समस्त मानव जाति के लिए कल्याणकारी बनाने का सामर्थ्य रखते हैं।
बृहस्पति 'राजा' और मंगल 'मंत्री' पद को सुशोभित करेंगे
इस वर्ष का ब्रह्मांडीय मंत्रिमंडल विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहाँ देवगुरु बृहस्पति 'राजा' की भूमिका में होंगे और मंगल 'मंत्री' के पद को सुशोभित करेंगे। ग्रहों का यह संयोग ज्ञान और साहस के संतुलन का प्रतीक है, जो सामाजिक जीवन में वैचारिक स्पष्टता और न्यायप्रियता की वृद्धि का संकेत देता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार, चैत्र प्रतिपदा का यह वही शुभ दिन है जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का कार्य आरंभ किया था। पुराणों में उल्लेख आता है: ब्रह्मा जी ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय के समय संपूर्ण जगत की रचना की थी।
आधार सत्य और मर्यादा पर टिका है, तो विजय निश्चित
यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अस्तित्व के आरंभ का उत्सव है। गुड़ी पड़वा के अवसर पर घर के मुख्य द्वार पर फहराई जाने वाली 'गुड़ी' इसी विजय और सृजन का ध्वज है। यह ध्वज हमें सिखाता है कि जीवन में कितनी भी चुनौतियाँ क्यों न हों, यदि हमारा आधार सत्य और मर्यादा पर टिका है, तो विजय निश्चित है। इस दिन नीम की कोमल पत्तियों के साथ मिश्री खाने की परंपरा है, जो जीवन के कड़वे और मीठे अनुभवों को समान भाव से स्वीकार करने के मानवीय मूल्य को रेखांकित करती है।
मानवीय अंतःकरण की शुद्धि चैत्र नवरात्रि
चैत्र नवरात्रि का आध्यात्मिक पक्ष मानवीय अंतःकरण की शुद्धि पर केंद्रित है। नौ दिनों तक चलने वाला यह व्रत और अनुष्ठान केवल शारीरिक उपवास नहीं, बल्कि काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे विकारों पर विजय पाने का एक मनोवैज्ञानिक अभ्यास है। 19 मार्च को उदयातिथि के साथ ही घटस्थापना का विधान है, जिसे कलश स्थापना भी कहा जाता है। कलश को ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप माना जाता है, जिसमें समस्त तीर्थों और देवताओं का वास होता है।
ये हैं घटस्थापा के शुभ मुहूर्त
इस वर्ष घटस्थापना के लिए सुबह 05:55 से 07:24 तक का समय अत्यंत शुभ है, जबकि अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:33 से 12:22 तक रहेगा। नवरात्रि के नौ दिन माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की साधना के माध्यम से हमें शक्ति, बुद्धि और धैर्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जो आधुनिक जीवन की आपाधापी में मानसिक शांति बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
महाअष्टमी का पर्व 26 मार्च को
इस वर्ष महाअष्टमी का पर्व 26 मार्च को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि का महत्व कन्या पूजन के साथ और भी बढ़ जाता है, जो नारी शक्ति के प्रति सम्मान और वात्सल्य के मानवीय मूल्य का जीवंत उदाहरण है। पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 25 मार्च की दोपहर से प्रारंभ होकर 26 मार्च की सुबह 11:48 तक रहेगी। इस दिन किया गया दान-पुण्य और साधना न केवल व्यक्तिगत सुख-समृद्धि प्रदान करती है, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। यह संवत्सर केवल ग्रहों की चाल नहीं, बल्कि हमारे संकल्पों की सिद्धि का कालखंड है। आइए, इस 'रौद्र' संवत्सर में शक्ति के साथ संयम और साहस के साथ विवेक को अपनाकर जीवन को सार्थक करें।
राशियों के लिए फलदायी गुड़ी पड़वा और चैत्र नवरात्र
मेष : साहस और पराक्रम में वृद्धि होगी। रुके हुए कार्य पूरे होंगे। क्रोध पर नियंत्रण रखना आवश्यक होगा।
वृषभ : आर्थिक स्थिति में सुधार के योग हैं । सुख-सुविधाओं में विस्तार होगा। वाणी की मधुरता से बिगड़े काम बनेंगे।
मिथुन : वैचारिक स्पष्टता आएगी । करियर में नए अवसर प्राप्त होंगे। स्वास्थ्य के प्रति थोड़ी सावधानी बरतनी होगी।
कर्क : परिवार में मांगलिक कार्यों के योग बनेंगे । मानसिक शांति का अनुभव होगा। निवेश के मामलों में जल्दबाजी न करें।
सिंह : नेतृत्व क्षमता का विकास होगा । सामाजिक मान-सम्मान में वृद्धि होगी। कार्यक्षेत्र में अधिकारियों का सहयोग मिलेगा।
कन्या : लंबी यात्राओं के योग हैं जो भविष्य में लाभकारी सिद्ध होंगे। आध्यात्मिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी।
तुला : अचानक धन लाभ की स्थिति बन सकती है । स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव रह सकता है। धैर्य से काम लें।
वृश्चिक : साझेदारी के कार्यों में सफलता मिलेगी । वैवाहिक जीवन में मधुरता आएगी। पुराने विवादों से मुक्ति संभव है।
धनु : शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी । कानूनी मामलों में सफलता मिल सकती है। अपनी कार्ययोजना को गुप्त रखें।
मकर : संतान पक्ष से शुभ समाचार प्राप्त होगा । शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति होगी। प्रेम संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी।
कुंभ: भूमि-भवन या वाहन सुख की प्राप्ति के योग हैं। पारिवारिक सुख-शांति में वृद्धि होगी। माता का सहयोग मिलेगा।
मीन : आत्मविश्वास में बढ़ोत्तरी होगी । छोटे भाई-बहनों का सहयोग प्राप्त होगा। छोटी यात्राएं लाभकारी रहेंगी।
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