रोशन रातें, खामोश इबादतें: ईद की खुशियां आईं मुहाने पर; बाजारों में उमड़ी खरीदारों की भीड़
KHULASA FIRST
संवाददाता

मुकद्दस माहे रमजान में परवान पर इबादत, घर-घर शुरू हुई ईद की तैयारी
सुबह तक जाग रहे शहर के मुस्लिम इलाके, रमजान की रौनक देखते ही बन रही
मासूम भी रख रहे रोजा, पढ़ रहे नमाज, जगह-जगह चल रहे इफ्तारी का दौर
चिलचिलाती धूप, सूरज के तेवर भी नहीं डिगा पा रहे रोजदारों को, पांच वक्त की नमाज और जकात में गुजर रहे दिन
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
ईद की खुशियां बस मुहाने पर आ गई हैं। जल्द ही ‘चांद मुबारक’ गूंजने वाला है। रंगत देखते ही बन रही है, अकलियत के इलाकों की, बाजारों की और उन चेहरों की भी, जो अल्लाह की इबादत में डूबे हुए हैं। माहे मुकद्दस रमजान में पांच वक्त की नमाज के साथ कठिन रोजे भी चल रहे हैं, जहां अन्न का दाना तो दूर जल की एक बूंद भी हराम है।
इतनी कठिन साधना के बाद भी चेहरे से टपकता नूर साफ इशारा कर रहा है कि बंदे की बंदगी परवददिगार के समक्ष कबूल हो रही है। रौनक से आबाद मुस्लिम इलाकों में सबसे बड़े पर्व की खुशियां सब जगह चहक रही हैं। शीर-खुरमे की मिठास के साथ आने वाली ईद की तैयारी में दिन ढलने से लेकर सुबह होने तक मुस्लिम इलाके जाग रहे हैं।
जवाहर मार्ग, बंबई बाजार पर तो रातें ऐसी रोशन हैं जैसे दिन निकला हो। यही नजारा कागदीपुरा, सिलावटपुरा, मुकेरीपुरा, जिंसी, बड़वाली चौकी, सदर बाजार, रानीपुरा, नयापुरा से लेकर सुदूर खजराना, चंदननगर, आजाद नगर तक एक समान हैं। रमजान की ये रंगत किसी को नजर आई हो या नहीं, हर बरस की तरह पक्का इंदौरी अखबार खुलासा फर्स्ट को नजर आई। न केवल आई, बल्कि दिल के नजदीक महसूस भी हुई। आप भी कीजिए महसूस....!!
श हर की एक बड़ी आबादी अपने ईष्ट की इबादत में मशगूल है। बगैर प्रचार-प्रसार के खामोशी से हजारों-लाखों सिर अल्लाह के सजदे में झुक रहे हैं। एक नहीं, पांच वक्त उसके सजदे में शीश झुक रहे हैं, जो समूची कायनात का मालिक है, जो बेहद रहमदिल हैं और सबका खैरख्वाह भी, जिसकी चौखट पर सब एक हैं।
उसी अल्लाह की बंदगी में उसके बंदे पूरी शिद्दत के साथ जुटे हैं। बगैर शोरशराबे के, बड़ी ही खामोशी से। मुकद्दस रमजान माह जो चल रहा है। हिजरी कैलेंडर का सबसे पवित्र माहे रमजान, अल्लाह की बंदगी का माह, जकात से सवाब पाने का माह। पवित्र कुरआन के नियमित पाठ के दिन। पाकीजगी के साथ किए जा रहे रोजे के दिन। अल्लाह की निर्दोष बंदगी के दिन, ईमान के दिन।
ये ही आबादी दिन ढलने के वक्त तेजी से घर की तरफ भागती नजर आती है। जैसे-जैसे दिन ढलने की तरफ बढ़ता है, एक होड़ सी मच जाती है, जल्द से जल्द घर या इबादतगाह तक पहुंचने की। इसके पहले की मगरिब का वक्त हो, अपने परिवार, अपने मोहल्लों तक पहुंचने की ये जद्दोजहद किसी को नजर नहीं आई?
फल की दुकानों, ठेलों, रेहड़ियों पर शाम के वक्त उमड़ती भीड़ अकलियत के अलावा किसने देखी? वे दस्तरख्वान देखे की नहीं, जो पूरे एक मोहल्ले, बस्ती या कॉलोनी को एक कुटुंब बना रहे हैं? एक साथ, एक वक्त, एक ही जाजम पर होती इफ्तारी का नजारा देखिए तो सही..! न कोई बड़ा, न छोटा। न अमीर, न गरीब। सब एक जाजम पर। नजर डालिए तो सही।
सेहरी से शुरू होकर ईशा की नमाज तक पाकीजगी एक जैसी पसरी हुई है। मन, वचन और कर्म काया से अल्लाह की इबादत हो रही है। नेकी और नेकनीयती की राह में रोजे ईमानदारी से पूरे किए जा रहे हैं। दिन निकलने से दिन ढलने तक के ये रोजे (उपवास) हो रहे हैं। ऐसी गर्मी में, अन्न का एक दाना तो दूर जल की एक बूंद भी नहीं।
होंठ सूखे या कंठ सूखे, रोजा मुकम्मल होना ही है। भले ही दिन कितना भी तपे। सूरज कितने की तीखे तेवर दिखाए, फिर भी न अन्न, न जल, न कोई फलाहार। इतनी कठिन इबादत का ये माहे रमजान और रोजे परवान पर हैं।
रोजेदारों को ये सुविधा भी नहीं कि वे रोजे से हैं तो आराम कर लें। कुछ पल ठंडी जगह बैठ जाएं। कूलर, एसी की हवा में सुस्ता लें। कतई नहीं, हरगिज नहीं। दिनचर्या में कोई बदलाव भी नहीं, रोजे से हैं तो क्या हुआ, कर्म पहले। जो घन चला रहा है वो वैसी ही हाड़तोड़ मेहनत करेगा जैसे आम दिनों में करता है।
नियमित दिनचर्या, कामकाज में कोई रद्दोबदल नहीं। नन्हे-नन्हे रोजदारों की संख्या भी कम नहीं जो अपने अब्बू-अम्मी, खाला, दादा-दादी से तोहफे पा रहे हैं और हार-फूलमालाओं के साथ नए कपड़े पहन मोहल्ले में घूम रहे हैं।
मुस्लिम बंधुओं के इलाकों में सुबह 3-4 बजे तक जाग रहे हैं। इन इलाकों में इबादतगाह ही नहीं, घर भी रोशनी से नहाए हुए हैं। दर्जियों की दुकानों पर लाइन लगी हुई है। गरारे-शरारे से लेकर कुर्ता-पायजामा वक्त पर सिल जाने की मिन्नतें नजर आ रही हैं।
सुंदर टोपियां भी सिर पर नाप लगाकर देख परख और खरीद रहे हैं। नए-नए शोरूम खुल गए हैं, जहां ख्वातूनों की भीड़ उमड़ी पड़ी हुई है। एक से बढ़कर एक रेडीमेड और कलात्मक कशीदाकारी की ड्रेस का बाजार आधी रात के बाद तक गुलजार है।
घर में भी ईद की तैयारी चरम पर जा पहुंची है। सूखे मेवे तैयार हो रहे हैं। खोपरा किसा जा रहा है। बादाम की कतरन कट रही है। शीरमाल आ जा रहे हैं। इस सबके बीच इफ्तारी की सामग्री की एक प्लेट मस्जिद में जा रही है और पास-पड़ोस में भी। अकलियत हिल-मिलकर त्योहार की रूहानियत को महसूस कर रही हैं।
इसके जरिये उस बंदे-परिवार की भी चिंता है, जिसके पास कुछ नहीं। सिवाय इबादत के। उसकी भी, जिसका यहां परिवार नहीं। मदरसों के उन नौनिहालों की भी फिक्र है जो मीलों दूर से अपने शहर में इल्म के लिए आएं हैं।
फिक्रमंदी इस बात की कि उसका भी रोजा खुले, जिसके पास इफ्तारी की इफरादी नहीं। खाट पर सूखती सिवइयों की महक बता रही है, बस अब चांद मुबारर होने वाला है।
हर तरफ सबाब कमाते लोग और अल्लाह की बंदगी में झुके शीश और दुआओं में उठे हाथ नजर आ रहे हैं। जकात के हिस्से को किसी गरीब, मजलूम, जरूरतमंद तक पहुंचाने की होड़ मची है। फजर, जौहर, असर, मगरिब, ईशा के साथ तरावीह की नमाज पढ़ी जा रही है।
घर के सदस्य के हिसाब से फितरा हो रहा है। अब ईदुल फित्र का मुकद्दस दिन का बेसब्री से इंतजार है। उस दिन की बाट जोही जा रही है, जो 30 रातों के बाद आ रही है। एक बेहद खूबसूरत चांद के साथ। जब एक साथ बोला जाएगा- चांद मुबारक।
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