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सरकारी जमीन पर सुनियोजित डकैती: विदुर नगर व झूलेलाल नगर मामले में 1 हजार करोड़ से अधिक के गबन का खुलासा

KHULASA FIRST

संवाददाता

21 जनवरी 2026, 10:52 पूर्वाह्न
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सरकारी जमीन पर सुनियोजित डकैती

फर्जी संस्थाएं, कूटरचित रजिस्ट्रियां, झूठे शपथ-पत्र और अपात्र सदस्यों के जरिये सरकारी जमीन की खुली लूट, एफआईआर और वसूली की मांग तेज

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सरकारी जमीन को निजी खजाना बनाने के ऐसे खेल का खुलासा हुआ है, जिसने प्रशासनिक तंत्र की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 1 हजार करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की शासकीय जमीन फर्जी सहकारी संस्थाओं के जरिये बेचे जाने का आरोप लगाते हुए शासकीय शिक्षक चंद्रकुमार भवानी ने पूरे मामले को सुनियोजित सरकारी धन गबन करार दिया है। विदुर नगर और झूलेलाल नगर के नाम पर हजारों फर्जी प्लॉट बेच दिए गए, लेकिन आज तक असली मालिकाना दस्तावेज किसी खरीददार के पास नहीं हैं।

चंद्रकुमार भवानी (पिता स्व. नारायणदास भवानी) (40), शासकीय शिक्षक निवासी बी-02, लक्ष्मी पैलेस, साधु वासवानी नगर, इंदौर ने आरोप लगाया कि विदुर नगर एवं झूलेलाल नगर संस्था के संचालकों ने सहकारिता विभाग, कलेक्ट्रेट सहित अन्य विभागों की मिलीभगत से शासकीय ग्रीन-लैंड जमीन को हड़पने की साजिश रची।

आरोप है कि फर्जी शपथ-पत्र, अपात्र सदस्यों का पंजीयन, कूटरचित नामांतरण और रजिस्ट्री शुल्क में अवैध छूट लेकर शासन को करोड़ों रुपए की आर्थिक क्षति पहुंचाई गई। विदुर नगर संस्था के नाम रजिस्ट्री क्रमांक 2584 एवं 2585 (14.09.1995) के आधार पर 135.69 एकड़ ग्रीन-लैंड जमीन में 5 हजार से अधिक फर्जी प्लॉटों का विक्रय कर दिया गया।

इसी जमीन में से 28.33 एकड़ पर फर्जी झूलेलाल नगर संस्था बनाकर रजिस्ट्री क्रमांक 4829 एवं 4830 (24.03.1998) के माध्यम से कृषि भूमि बताकर विक्रय कर दिया गया।

मालिकी विवाद और दबाई गई सच्चाई
कलेक्टर के समक्ष 196.69 एकड़ ग्रीन-लैंड जमीन का मालिकी निर्णय 29.04.1999 को हुआ, जिसमें स्पष्ट किया गया कि जमीन की मालिकी श्रीमंत महारानी उषाराजे होलकर की है। इसके बावजूद निर्णय से पूर्व की गई चार फर्जी रजिस्ट्रियों की जानकारी जानबूझकर छिपाई गई, जिन्हें निर्णय अनुसार फर्जी माना गया।

विदुर नगर रजिस्ट्रेशन में विक्रेता बताए गए शुक्ला परिवार की 61.2 एकड़ भूमि पर 1772 फर्जी रजिस्ट्रियां कर दी गईं, जिन पर रजिस्ट्री शुल्क की छूट भी ली गई। कुल मिलाकर 135 एकड़ से अधिक भूमि के अवैध विक्रय से शासन को 1 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान पहुंचाया गया।

प्रशासन पर भी सवाल
बताया गया कि 3 नवंबर 2015 को संबंधित कार्यालय द्वारा सूचना-पत्र जारी कर कलेक्टर एवं सहकारिता विभाग से जांच की बात कही गई थी, लेकिन प्रकरण को वर्षों तक दबाए रखा गया। अब 27 जनवरी की जनसुनवाई में शिकायत दर्ज कराते हुए दोषियों पर एफआईआर, अवैध रूप से बेची गई जमीन की वसूली और रजिस्ट्री शुल्क की रिकवरी की मांग की गई है।

ये चर्चित नाम भी घेरे में
शिकायत में कुछ प्रतिष्ठित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के मालिकों के नाम का भी खुलासा हुआ है, जो इस गबन में दोषी हैं। इनमें शिरोमणि ज्वेलर्स (सराफा बाजार), आरती स्वीट्स (टॉवर चौराहा), गुलमोहर मार्केटिंग, आर्य कन्फेक्शनरी (पोलो ग्राउंड) शामिल बताए गए हैं।

संगठित सरकारी धन का गबन
यह मामला सिर्फ जमीन घोटाले का नहीं, बल्कि प्रशासनिक संरक्षण में हुए संगठित सरकारी धन गबन का गंभीर उदाहरण है। अब सवाल यह है कि क्या दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी, या फिर यह फाइल भी बाकी घोटालों की तरह दफ्तरों की अलमारियों में दफन हो जाएगी? जनता की निगाहें अब कार्रवाई पर टिकी हैं।

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