पीटीएस में हिटलर मैडम का आतंक: 12 साल से जमीं एडिशनल एसपी पर महिला कर्मियों ने लगाए प्रताड़ना के आरोप
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
तानाशाही का दौर इतिहास बन चुका है, लेकिन कुछ अधिकारी साबित कर रहे हैं सत्ता का दुरुपयोग आज भी खत्म नहीं हुआ है। पीटीएस (पुलिस ट्रेनिंग स्कूल) को लेकर आई शिकायतें इसी ओर इशारा कर रही हैं, जहां एक महिला अधिकारी के रवैये को लेकर कई पुलिसकर्मी, खासकर महिला कर्मी सालों से असंतोष जाहिर कर रहे हैं पर उनकी सुनने वाला कोई नहीं।
पीटीएस में एडिशनल एसपी गीता चौहान करीब 12 वर्ष से अंगद के पैर की तरह जमी हैं। इतने लंबे समय में उन्होंने महाभारत का ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है कि वरिष्ठ अधिकारी भी धृतराष्ट्र बनकर मौन साधे हुए हैं।
पुलिसकर्मियों का कहना है कई बार उनके व्यवहार से परेशान होकर विरोध हुआ लेकिन मैडम की हिटलरशाही पर कोई असर नहीं पड़ा। यहां तक कि महिला आरक्षकों को भी नहीं बख्शतीं हैं।
महिला अधिकारी व कर्मचारियों की विशेष प्रताड़ना- एक महिला आरक्षक ने ‘खुलासा फर्स्ट’ को बताया मैडम का इतना आतंक है कि बराबरी के अधिकारी भी परेशान रहते हैं।
कई महिला अधिकारी त्रस्त होकर तबादला करा चुकी हैं। पीटीएस में महिला पुलिसकर्मियों की संख्या लगभग 25 है। इनकी शिकायत आखिर सुने कौन—यह बड़ा सवाल बन गया है। कुछ महिला अधिकारियों ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर सीधे आरोप लगाया महिलाओं की समस्याओं को लेकर मैडम कभी गंभीर नहीं रहतीं।
अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए सभी को निशाने पर ले लेती हैं चाहे कोई पारिवारिक परेशानी से जूझ रही हों या किसी कारणवश शहर से बाहर जाने में असमर्थ हों। यदि किसी ने उनके आदेशों पर सवाल उठाने की हिम्मत कर दी, तो उसे पीटीएस से बाहर करवाने तक की कोशिश शुरू हो जाती हैं।
विभाग में ऐसा प्रभाव बना लिया है कि उनके खिलाफ खुलकर बोलने से कर्मचारी कतराते हैं। कुछ पुलिसकर्मियों का कहना है विभाग में ऐसा माहौल बन गया है मानो कोई चक्रव्यूह रच गया हो।
वरिष्ठ अधिकारियों की चुप्पी पर भी सवाल
कुछ पुलिसकर्मियों का आरोप है कई बार वरिष्ठ अधिकारियों तक भी बात पहुंचाई लेकिन ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई। वे खुलकर सामने आने से डरते हैं, क्योंकि करियर पर असर पड़ सकता है। हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित अधिकारी की प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। उनका पक्ष सामने आता है तो स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
महिला कर्मियों की पीड़ा है महिला ही महिला की सबसे बड़ी दुश्मन बन बैठी है। यह सिर्फ कहावत नहीं, बल्कि हकीकत है—वह भी ऐसे विभाग में, जो देशभक्ति और जनसेवा की भावना के साथ खाकी वर्दी धारण करता है। खाकी का मतलब अनुशासन, संवेदनशीलता और जनता की सेवा है, लेकिन दुर्भाग्य है कुछ लोग इसी वर्दी के सहारे अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल करते हैं।
सवाल है जिस वर्दी का मकसद सेवा और सुरक्षा है, वहीं अगर तानाशाही का प्रतीक बन जाए तो पीड़ित अपनी आवाज किस तक पहुंचाए?
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