दिल में होली जल रही है: गोबर के बरगुले; शकर के हार कंगन अब कहां
KHULASA FIRST
संवाददाता

कभी होली का डांडा गड़ते ही छा जाती थी होली की रंगत, अब वो बात कहां?
अन्य त्योहारों की तरह रंगों का ये पर्व भी अब रस्म अदायगी तक सिमटता जा रहा
चौक-चौबारों- चौराहों पर अब नहीं गाड़े जाते होली के डांडे, अब होली वाले दिन ही रोपित होता है डांडा
कभी महीनेभर पहले ही गड़ जाता था होली का डांडा, माघ पूर्णिमा से फागुन पूर्णिमा तक छाई रहती थी होली की मस्ती
रसीद-कट्टे छपते थे, बड़े-बूढ़े चंदा जमा करने निकलते थे, 2-5 रुपए के लिए हर घर होती थी दस्तक
डीजे का शोर नहीं होता था, बिजली के खंभे पर बंध जाती थी ‘चिलम', होली के गीतों से बनता था माहौल
आज जैसे फागोत्सव नहीं मनते थे, न फाग गाने वाले भजन गायक, दिन ढलने के बाद बजती थी चंग-ढप, जनसामान्य ही होता था गायक
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कभी इंदौर में पूरे महीने होली की मस्ती छाती थी। माघ पूर्णिमा पर पूरे विधि-विधान से होली के डांडे रोपित किए जाते थे। जब डांडे के लिए डामर की सड़क खोदी जाती थी तो उत्साह उफान पर होता था। खुदाई भी हिल-मिलकर देखी जाती थी। गहरे गड्ढे में पान-सुपारी और चवन्नी (चार आने) उतारे जाते और फिर कुमकुम पूजन के साथ डांडा रोप दिया जाता था।
बस, उसी दिन से मोहल्ले में, गली में, बस्ती में, गांव में, शहर में होली की शुरुआत हो जाती थी। डांडे वाले स्थान के बगल में ही एक जगह तख्त लग जाता था और दरी की बिछात के साथ उसी दिन से मोहल्ले के ‘हुरियारों' का ठिया-ठिकाना हो जाता था। डांडा गड़ने के बाद हुरियारों का सबसे अहम काम होता था, होली दहन आयोजन का बंदोबस्त करना।
मुख्य खर्चा होलिका दहन के लिए लकड़ी-कंडे का तो होता ही था, रिकार्ड प्लेयर के साथ लाउडस्पीकर भी एक बड़े खर्च में शामिल होता था। लंबी चिलम पर गूंजते होली सहित अन्य फिल्मी गीत उत्सव की आन-बान-शान होते थे। लिहाजा पैसों का बंदोबस्त अहम होता था।
तब ये त्योहार सामूहिक प्रयास से पूरे होते थे। समाज की बड़ी हिस्सेदारी इसे रंग देती थी। लिहाजा समाज से ही चंदा लेकर उत्सव मनाना सबसे अहम काम होता था। बाकायदा रसीद-कट्टे छपते थे। जो नहीं छपवाते, उनके लिए छपे-छपाये, यानी रेडीमेड रसीद-कट्टे भी उपलब्ध रहते थे।
परम्परा आज भी है कायम...
जी हां, परम्पराओं का विसर्जन नहीं होता। कुछ लोग होते हैं, जो लोक परम्परा की पवित्रता को कायम रखते हैं। इंदौर के सुदामा नगर के बागोरा परिवार इस परंपरा को आज भी निभाता है। इस संयुक्त परिवार की छोटी बहू विद्या बागोरा आज भी बड़े जतन स्वगोबर के बरगुले गढ़ती हैं। उन्हें सुखाती हैं। फिर माला के रूप में पिरोती है। फिर ये माला ही होलिका को समर्पित होती है। यानी होली उत्सव के प्रति लोकआस्था की आस अब भी जिंदा हैं। ...सुकून है।
रसीद-कट्टे आने के बाद सबसे बड़ा काम चंदा करने का ही होता था। इसके लिए दो पाली में काम होता था। सुबह और दिन ढलने के बाद से रात तक। हर घर में दस्तक होती थी। एक भी परिवार छूटता नहीं था। या यूं कह लें कि बख्शा नहीं जाता था। चंदा कोई आज जैसा भारी-भरकम नहीं होता था।
महज दो रुपए, पांच रुपए के चंदे की आस और मनुहार होती थी। दस रुपए व इक्कीस रुपए वाले तो मोहल्ले में ‘दानवीर' की श्रेणी में आते थे। रुपया-आठआना, यानी अठन्नी लेने-देने में भी कोई शर्म नहीं होती थी। लेकिन चंदा हर हाल में ‘उगाया' ही जाता था। बहुत कम होते थे, जो इसके लिये ना-नुकुर करते।
ऐसे फिर ‘हुरियारों' के टारगेट पर हो जाते थे, जिन्हें होली के दिन ‘तल-तल' दिया जाता था। चंदा जैसे-जैसे जमा होता जाता, त्योहार की तैयारियां भी वैसे-वैसे आकार लेती थीं। इसमें सबसे अहम होती थी रंग-बिरंगी कागज के ताव की तिकोनी आकार की लड़ियां। ताव, यानी हर रंग का पतला कागज खजूरी बाजार से खरीदकर लाया जाता।
फिर मोहल्ले का ही कोई जानकार टेलर वाली कैंची से कटिंग करता था। एक डिब्बे में आटे व सरस की लाई बनती थी। गोंद नहीं, न आज के जमाने का फेविकोल। बजट ही कहां होता था गोंद का। लिहाजा आटे की लाई से सुतली पर ये कागज की रंग-बिरंगी झंडियां चिपकाई जाती थीं। इन्हीं लड़ियों से पहले होलिका दहन स्थल और फिर गली सजाई जाती थी।
इस सजावट की रंगत देखते ही बनती थी। हो भी क्यों नहीं? हाथ की मेहनत और दिन-रात की सामूहिक तैयारी जो होती थी। होलिका दहन के लिए लकड़ी भले ही एक-दो दिन पहले खरीदी जाती थी, लेकिन मांगना तो पहले ही दिन से शुरू हो जाता था। होली के लिए लकड़ियां भी मांगने निकलते थे।
लकड़ी के पीठे व गली-मोहल्लों में मौजूद टाल वाले जानते थे कि मांगने आएंगे, तो वे उस हिसाब की लकड़ियां अलग से निकालकर रखते थे। लकड़ी में खास खरीदी तो ‘होली के डूंड' की होती थी। इस भारी-भरकम डूंड की खरीदी व लिवा लाने के लिए बाकायदा मोहल्ले में ठेला सजता था। दरी बिछाकर बाल-गोपालों की टोलियों के संग लकड़ी लेने मोहल्ले से जब हुरियारे जाते तो पूरा मोहल्ला देखता था। ठेलाभर लकड़ी के साथ जब डूंड लेकर टोली लौटती थी तो दृश्य ऐसा होता था, जैसे युद्ध जीतकर लौटे हों।
...तब जीवन में ठहराव था, तभी तो त्योहार भी ठहर जाते थे... आज जैसा डीजे का शोर तब नहीं होता था। बिजली के खंभों पर चिलम बांध दी जाती थीं। कम से कम दो और ज्यादा से ज्यादा अगले मोहल्ले के मुहाने तक। ये ही शान होती थी कि फलाने मोहल्ले वालों ने 20 चिलम बांधी हैं।
एक रिकॉर्ड प्लेयर से इन्हें जोड़ा जाता था। रिकॉर्ड प्लेयर के पास एक आदमी की स्थायी ड्यूटी होती थी। प्लेयर पर डिश के आकार की फिल्म संगीत प्लेट घूमती थी। न सिर्फ होली के गीत, बल्कि ताजा-ताजा सिनेमाघरों में लगने वाली फिल्मों के गीत भी गूंजते थे। लोग बड़े चाव से गीत सुनते थे।
आज जैसे संसधान जो नहीं थे गीत-संगीत के कि झट-से सुन लें, जो मर्जी का वो। लिहाजा चिलम के गीत की गूंज किसी को ‘डिस्टर्ब' नहीं करती थी। न थाने में शिकायत होती, न परीक्षा का हवाला देकर चिलम का गला घोंटा जाता था।
बच्चे तब भी पढ़ते थे, पढ़ाई तब भी अव्वल होती थी, पढ़ाकू तब भी होते थे, कॅरियर ओरिएंटेड पेरेंट्स तब भी होते थे, लेकिन सबसे आगे निकलने की अंधी दौड़ तब नहीं थी।
तब ठहराव था और ये ही ठहराव त्योहार को एक महीने तक मनाने की कूवत, उत्साह, उमंग व तरंग देता था। होली उनमें से एक थी। अब तो इस सबको याद कर बस, दिल में होली जल रही है।
…गर, घर में बाल-गोपाल न हों तो पता ही नहीं चले कि रंग पर्व ने कब दस्तक दे दी। है न? रंग-गुब्बारे-पिचकारी की बच्चों की जिद हमसे भी त्योहार मनवा देती है। अन्यथा अब तो ऐन मुहाने पर आकर ही अहसास होता है... अरे, होली आ गई! बेमन से ही सही, बाजार भी सजता है।
याद दिलाता है कि देश ही नहीं दुनिया का सबसे अनूठा होली का त्योहार आ गया है। हर त्योहारों जैसा, होली पर्व भी एक दिन के उत्सव के रूप सिमट गया है। कभी ये त्योहार ऐसा नहीं मनता था। एक दिन का नहीं, पूरे एक महीने का होता था ये रंग पर्व। माघ पूर्णिमा से फागुन पूर्णिमा तक।
होली के ठीक एक महीने पहले होली का डांडा गड़ जाता था। चौक-चौबारों-चौराहों पर गाड़े जाने वाले ये डांडे जनसामान्य को याद दिलाते थे कि बस, होली आने वाली है। अब डांडा भी उस दिन रोपित होता है, जिस दिन होलिका दहन होना है। यानी एक दिन पहले भी नहीं।
यानी महीनेभर की परंपरा महज कुछ घंटों में आकर सिमट गई है। अन्य त्योहारों के समान ये पर्व भी रस्म अदायगी तक सिमट गया है। जेहन में जब अहिल्या नगरी इंदौर की अतीत की होली याद आती है तो होली से पहले दिल जल जाता है।
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