करोड़ों के भ्रष्टाचार के आरोपी अफसरों पर मेहरबान सरकार: ईओडब्ल्यू में केस दर्ज; फिर भी पद से हटाने में क्यों हो रही देरी
KHULASA FIRST
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्ट,भोपाल।
प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य बालाघाट जिले में करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार का एक मामला चर्चा में है। हैरानी की बात यह है कि ईओडब्ल्यू द्वारा गंभीर धाराओं में केस दर्ज होने के बाद भी आरोपी अधिकारियों को नहीं हटाया गया है। इसे लेकर अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर सरकार इन अधिकारियों पर इतनी मेहरबान क्यों है?
जानकारी के अनुसार 27 फरवरी 2026 को ईओडब्ल्यू जबलपुर ने राइस मिलर प्रकाश सचदेव और समीर सचदेव सहित विपणन संघ और नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों-कर्मचारियों समेत कुल आठ लोगों के खिलाफ कस्टम मिलिंग में भ्रष्टाचार और 2 करोड़ 79 लाख रुपये की धोखाधड़ी के मामले में अपराध (क्रमांक 0039/2026) दर्ज किया था।
इस मामले में मप्र विपणन संघ के उपप्रबंधक (वित्त) हरीश कोरी और जिला विपणन प्रबंधक विवेक तिवारी को भी आरोपी बनाया गया है। हरीश कोरी के पास मप्र नागरिक आपूर्ति निगम, बालाघाट के जिला प्रबंधक का अतिरिक्त प्रभार भी है। ईओडब्ल्यू ने इनके खिलाफ बीएनएस-2023 की कई गंभीर धाराओं के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया है।
ईओडब्ल्यू की एफआईआर में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि कस्टम मिलिंग में हुए भ्रष्टाचार और शासन के साथ 2 करोड़ 79 लाख रुपये की धोखाधड़ी में इन अधिकारियों की भूमिका सामने आई है। गंभीर आरोपों के बावजूद दोनों अधिकारी अभी तक अपने पदों पर बने हुए हैं। यही वजह है कि प्रशासनिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि जब ईओडब्ल्यू ने मामला दर्ज कर लिया है, तो फिर इन्हें हटाने में संकोच किस बात का हो रहा है।
जांच प्रभावित होने की आशंका: जानकारों का कहना है कि जिन पदों पर रहते हुए कस्टम मिलिंग में कथित भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी हुई, यदि उन्हीं पदों पर आरोपी अधिकारियों को बने रहने दिया गया, तो इससे जांच प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही यह भी डर है कि आरोपी अधिकारी साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर सकते हैं।
क्या कहता है नियम
सामान्य प्रशासन विभाग के 23 फरवरी 2012 को जारी आदेश (क्रमांक 11-19/20211/1-10) के अनुसार, यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ ईओडब्ल्यू द्वारा भ्रष्टाचार या धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया जाता है, तो ऐसे अधिकारी को तीन दिनों के भीतर अन्यत्र स्थानांतरित किया जाना चाहिए।
साथ ही ऐसे अधिकारियों को संवेदनशील और महत्वपूर्ण दायित्वों से भी अलग रखने का प्रावधान है। इसके बावजूद बालाघाट के इस मामले में अब तक कोई कार्रवाई नहीं होने से सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।
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