क्या अहिल्या नगरी में गहराएगा जल-संकट कम बारिश के बाद अभी से फूल रहे हाथ-पांव: नर्मदा के भरोसे सधेगा इंदौर का जल-चक्र; पर असली ताकत नागरिक अनुशासन की
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
देश की 'स्वच्छता राजधानी' के रूप में विश्व पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाली अहिल्या नगरी इंदौर इस बार एक गंभीर प्राकृतिक और पर्यावरणीय परीक्षा के दौर से गुजर रही है।
अपने दृढ़ संकल्प और जन-भागीदारी से हर असंभव को संभव बनाने वाले इस महानगर के सामने इस बार चुनौती कचरा प्रबंधन की नहीं, बल्कि जीवन की सबसे मूलभूत आवश्यकता- जल-सुरक्षा की है।
इस वर्ष मानसून के दौरान अल नीनो के असर और बादलों की बेरुखी के चलते पूरे मालवा-निमाड़ अंचल सहित इंदौर में औसतन 27 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 1 जून से 30 सितंबर के बीच जिले में सामान्य 868.1 मिलीमीटर बारिश के मुकाबले महज 633.1 मिलीमीटर (लगभग नौ इंच कम) पानी ही बरसा है।
वर्षा की यह कमी केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि इसने आगामी भीषण गर्मी के महीनों में 35 लाख से अधिक की आबादी वाले इस आर्थिक केंद्र के जल-चक्र को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है।
मानसून की इस बेरुखी का सीधा असर शहर की प्यास बुझाने वाले पारंपरिक और मुख्य जल स्रोतों पर साफ नजर आने लगा है। अगस्त के शुरुआती दौर में ही इंदौर के प्रमुख जलाशय यशवंत सागर में पानी का स्तर घटकर मात्र 12 फीट रह गया था, जबकि बड़ी बिलावली में 7.8 फीट पानी शेष था और छोटी बिलावली पूरी तरह सूखकर मैदान में तब्दील हो चुकी थी। वर्तमान में इंदौर की पेयजल आपूर्ति का पूरा ढांचा खरगोन जिले के जलूद से लगभग 80 किलोमीटर दूर पाइपलाइनों के जरिए लाए जाने वाले नर्मदा जल पर निर्भर है।
शहर को रोजाना नर्मदा जल प्रदाय योजना से करीब 450 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) पानी प्राप्त होता है। इसके बावजूद ढांचागत सीमाओं के कारण शहर के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से में आज भी नर्मदा की सीधी पाइपलाइन नहीं पहुंच सकी है, जहां की प्यास बुझाने के लिए ट्यूबवेलों और जीपीएस युक्त टैंकरों के जरिए करीब 200 एमएलडी अतिरिक्त पानी खींचना पड़ता है। इस प्रकार इंदौर की कुल दैनिक जल आवश्यकता 650 से 700 एमएलडी तक पहुंच जाती है।
पिछली गर्मियों में ही शहर के करीब 6,000 नलकूप पूरी तरह सूख गए थे। इस बार 27 प्रतिशत कम बारिश होने के कारण भूजल पुनर्भरण न के बराबर हुआ है, जिससे इस बार नलकूपों के बंद होने का आंकड़ा और भयावह हो सकता है।
इस आसन्न संकट से निपटने के लिए नगर निगम ने राज्य सरकार से 50 करोड़ रुपये के आपातकालीन राहत पैकेज की मांग की है। इसे सैद्धांतिक रूप से मंजूरी मिल भी चुकी है।
उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने स्पष्ट रूप से अधिकारियों और इंदौर की जनता को आश्वस्त किया कि शहर को जल संकट से बचाने के लिए वित्तीय संसाधनों की कोई कमी आड़े नहीं आने दी जाएगी।
उन्होंने बैठक में कहा कि इंदौर नगर निगम द्वारा वर्तमान में मांगे गए 50 करोड़ रुपये के अलावा, यदि आगामी गर्मियों और इस संकट से पूरी तरह निपटने के लिए 100 करोड़ रुपये की भी आवश्यकता होगी तो राज्य सरकार उस राशि को भी तुरंत उपलब्ध कराएगी।
प्रशासनिक तैयारियों के बीच राज्य के नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भी शहरवासियों से अभी से सचेत होने और पानी बचाने को दैनिक आदत बनाने की अपील की है।मंत्री विजयवर्गीय ने अपने निवास का उदाहरण साझा करते हुए रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) प्यूरीफायर से निकलने वाले व्यर्थ पानी के दोबारा इस्तेमाल का एक व्यावहारिक और सटीक तरीका शहर के सामने रखा।
उन्होंने बताया कि आमतौर पर आरओ से 1 गिलास शुद्ध पानी निकलने पर 2 गिलास पानी बर्बाद होकर बह जाता है। यदि इस वेस्ट वाटर पाइप को एक संग्रहण टैंक से जोड़ दिया जाए, तो उस पानी का उपयोग बर्तन धोने, कपड़े साफ करने, घर का पोछा लगाने और बागवानी में बेहद कुशलता से किया जा सकता है।
सरकार और इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं की सीमाएं हैं, लेकिन इस संकट का वास्तविक समाधान नागरिक स्तर पर अपनाए जाने वाले अनुशासन में निहित है। इसी परिदृश्य में विशेषज्ञों द्वारा प्रति व्यक्ति 70 लीटर दैनिक जल-बजट का एक अनूठा गणित प्रस्तुत किया गया है।
यदि इंदौर का प्रत्येक नागरिक संयम बरतते हुए अपने दैनिक जल उपयोग का प्रबंधन करे, तो इस 70 लीटर के बजट में जीवन बेहद सुगमता से चल सकता है। अनुशासित बजट को इंदौर की 35 लाख की आबादी पर लागू किया जाए, तो पूरे शहर की कुल दैनिक जल-खपत घटकर मात्र 245 एमएलडी रह जाएगी।
यह वर्तमान में हो रही 650 एमएलडी की भारी-भरकम मांग की तुलना में 60 प्रतिशत से भी अधिक की सीधी बचत है। यह अंतर इतना विशाल है कि इसके लागू होते ही न केवल नर्मदा और नलकूपों पर पड़ने वाला अतिरिक्त दबाव खत्म हो जाएगा।
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