सिर्फ पुतले का दहन क्यों: हर साल आश्विन शुक्ल दशमी पूछती है हमारे भीतर का सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

शहर में धूमधाम से मनेगी विजयादशमी, दस सिर, दो कथाएं और एक संदेश
अग्नि, आस्था और अहंकार, इंदौर की शाम और दशहरे के वे अनछुए पन्ने, जो इतिहास में खो गए
धनुष झुका, शमी महका और रावण जला: त्रेता से लेकर मालवा के चौपालों तक विजयादशमी का महापाठ
सोने जैसी पत्तियां, अस्त्रों की पूजा और दशानन का विरोधाभास, कुछ इस तरह इतिहास रचता है दशहरा
हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शाम ढलने पर इंदौर के दशहरा मैदान, चिमनबाग, तिलक नगर और शहर के तमाम कोनों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले आग के हवाले किए जाएंगे। उस पल हजारों की संख्या में उठी निगाहें आसमान की लाल होती चादर को देखेंगी, लेकिन पटाखों की इस गड़गड़ाहट और आतिशबाजी के शोर के बीच एक सवाल जो हर साल अनसुलझा रह जाता है- यह जीत असल में किसकी है और इसे मनाने की जड़ें इतिहास में कहां तक जाती हैं?
दो कथाएं और एक साझा पड़ाव
शस्त्र पूजन की परंपरा केवल युद्ध या हिंसा का प्रतीक नहीं
दशहरे पर शस्त्र पूजन की परंपरा युद्ध या हिंसा का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह आत्मरक्षा और धर्म रक्षा' के उस महान संकल्प से जुड़ी है, जो सबके लिए आवश्यक है। सनातन संस्कृति में शस्त्र को केवल मारने का साधन नहीं, बल्कि दुर्जनों के दमन और सज्जनों की रक्षा करने वाला 'पवित्र अस्त्र' माना गया है।
महाभारत काल में पांडवों द्वारा अज्ञातवास समाप्त कर शमी वृक्ष से अपने गांडीव और अस्त्र-शस्त्र निकालकर उनकी पूजा करने की घटना इसी बात का प्रमाण है कि शक्ति के बिना शांति की रक्षा संभव नहीं।
विजयादशमी अथवा दशहरा शब्द का शाब्दिक अर्थ ही है-दस सिरों को हरने वाला। एक तरफ जहां त्रेतायुग में आश्विन शुक्ल दशमी के दिन भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर धर्म की स्थापना की थी, वहीं दूसरी ओर इस तिथि का एक और प्रबल पौराणिक आयाम है।
देवी महात्म्य के अनुसार नौ दिनों के महासंगम और कठिन संग्राम के बाद मां दुर्गा ने महिषासुर का वध इसी दशमी को किया था। यही कारण है कि नवरात्र की शक्ति-साधना का पूर्ण विराम विजयादशमी पर होता है। यानी एक ही दिन में राजा की मर्यादा और देवी का पराक्रम दोनों अपनी विजय दर्ज कराते हैं।
बंगाल की प्रसिद्ध 'कृत्तिवासी रामायण' में एक बेहद मार्मिक और कम चर्चित प्रसंग आता है। युद्ध के मैदान में उतरने से पहले श्रीराम ने मां शक्ति को 108 नीलकमल चढ़ाने का संकल्प लिया।
अनुष्ठान के अंतिम क्षणों में जब एक कमल कम पड़ गया तो मर्यादा पुरुषोत्तम ने अपनी ही कमल जैसी आंख अर्पित करने के लिए प्रत्यंचा पर बाण चढ़ा लिया। तब देवी को प्रकट होकर आशीर्वाद देना पड़ा। यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि सबसे बड़े योद्धा के हाथ में भी यदि धनुष था तो वह जीत से पहले शक्ति के चरणों में झुका था।
देश के रंग: जहां दशहरा कुछ अलग कहता है
दशहरा केवल पुतला दहन का नाम नहीं है, भारत के भूगोल में यह हर जगह अलग रूप धरता है।
बस्तर (छत्तीसगढ़)- यहां दशहरा 75 दिनों तक चलता है और रावण जलाया नहीं जाता। देवी दंतेश्वरी की आराधना और आठ पहियों वाले विशाल काष्ठ रथ की अनूठी यात्रा इसकी पहचान है।
कुल्लू (हिमाचल प्रदेश)- जब बाकी देश में उत्सव ढल रहा होता है, तब कुल्लू का दशहरा शुरू होता है। घाटी के सैकड़ों देवता अपनी पालकियों में सवार होकर भगवान रघुनाथ के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचते हैं।
मैसूरु (कर्नाटक)- मैसूरु शहर का नाम ही महिषासुर के वध से जुड़ा है। यहां सजे-धजे हाथियों की भव्य शाही शोभायात्रा सदियों से दुनिया भर के सैलानियों को आकर्षित करती है।
और इसके उलट, कुछ हिस्से ऐसे भी हैं जहां रावण को जलाया नहीं, बल्कि पूजा जाता है। मध्यप्रदेश के मंदसौर में रावण को दामाद (मंदोदरी का मायका) माना जाता है, जहां कई परिवार उनकी प्रतिमा के आगे शीश झुकाते हैं। कानपुर में दशानन का मंदिर साल में सिर्फ इसी एक दिन खुलता है, जहां उन्हें प्रकांड विद्वान और परम शिवभक्त के रूप में याद किया जाता है।
इंदौर में भी एक परिवार रावण की पूजा करता आ रहा है। शहर के परदेशीपुरा क्षेत्र के गौहर नगर में रावण का मंदिर है। यह लंकेश्वर महादेव मंदिर विजयादशमी पर शहर में आकर्षण का केंद्र रहता है. रावण के मंदिर को गौहर परिवार ने स्थापित किया है।
मंदिर में दशानन की प्रतिमा को 2010 के दसवें महीने में ठीक 10 बजकर 10 मिनट और 10 सेकंड पर स्थापित किया गया था तब से मंदिर में रोजाना सुबह इसी समय रावण की विशेष पूजा होती है।
महाभारत से मालवा तक: शमी और 'सोने' की परंपरा
इस पावन तिथि के तार महाभारत काल से भी जुड़ते हैं। अज्ञातवास के अंतिम पड़ाव में पांडवों ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र शमी (खेजड़ी) के वृक्ष की कोटर में सुरक्षित छिपाए थे। जब विराट नगर में कौरवों से आमना-सामना हुआ, तो अर्जुन ने इसी वृक्ष से अपना गांडीव निकाला था। तभी से दशहरे के दिन शस्त्र और शमी पूजन की परंपरा अमर हो गई।
मालवा और महाराष्ट्र में इस दिन 'आपटा' या शमी की पत्तियां एक-दूसरे को बांटने का रिवाज है, जिन्हें प्रेम से 'सोना' कहा जाता है। इसके पीछे रघुवंश की वह कथा है जब गुरुदक्षिणा चुकाने आए कौत्स ऋषि के लिए कुबेर ने रातों-रात सोने की वर्षा कर दी थी।
कहते हैं वे मुद्राएं शमी के पेड़ों पर गिरी थीं। इसलिए शाम को लोग एक-दूसरे को पत्तियां सौंपकर कहते हैं- सोना लीजिए, सोने जैसे रहिए। मराठाकाल की 'सीमोल्लंघन' की रस्म भी इसी दिन जुड़ी है, जब राजा अपनी सीमाओं को लांघकर नई मुहिम पर निकलते थे। आज भी कई घरों में इस दिन नए वाहन, संपत्ति या व्यापार की शुरुआत को अत्यंत शुभ माना जाता है।
असल सवाल: भीतर के रावण का क्या?
यह विरोधाभास ही दशहरे के पर्व को सबसे गहरा बनाता है। जिस रावण को हम जलाते हैं, वह वेदों का मर्मज्ञ था, जिसके पास सोने की लंका और अतुलनीय बल था। फिर भी वह परास्त हुआ, क्योंकि उसका अहंकार उसकी बुद्धि पर भारी पड़ गया था।
उसके दस सिर और कुछ नहीं, बल्कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर (ईर्ष्या) जैसे आंतरिक विकारों के ही प्रतीक हैं। शाम को जब मैदानों में आतिशबाजी के बीच कागज और बांस का रावण धधकेगा और बच्चे तालियां बजाएंगे, तब यदि हम कुछ पल ठहरकर खुद से यह सवाल पूछ सकें कि इस बार हमारे भीतर के रावण का कौन सा सिर कटेगा? तभी इस पर्व की सार्थकता पूरी होगी।
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