चौराहों पर आम नागरिक की फजीहत का कब होगा अंत: फाइलों में उलझा ट्रैफिक; कागजी आंकड़ों और दावों के बीच हर शाम हांफती है शहर की रफ्तार
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दोपहर की धूप में इंदौर की फिजा फाइलों और दलीलों से गर्म होती है और शाम ढलते-ढलते वही फिजा गाड़ियों के हॉर्न, धुएं और बेबस आंसुओं से भारी हो जाती है। एक तरफ अदालत में इंदौर के बिगड़ते ट्रैफिक, हांफते सिग्नलों और बेबस हो चुकी व्यवस्था पर जिरह होती है तो दूसरी तरफ शाम होते-होते मालवा मिल, पाटनीपुरा और विजय नगर के चौराहे हर सवाल का सबसे जीवंत और कड़वा जवाब देते नजर आते हैं।
इंदौरवासी पिछले कई सालों से अपनी गाड़ियों के मीटर पर नहीं, बल्कि चौराहों पर लगने वाले जाम में अपना कीमती वक्त गंवाने को मजबूर हो रहे हैं।
शहर के 92 सिग्नलों में से अधिकांश का भगवान भरोसे चलना इस बात का सबूत है कि हमारी योजनाएं सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए हैं।
जरा सोचिए, जिस शहर की पहचान उसकी रफ्तार और स्वच्छता से थी, वहां पाटनीपुरा से मालवा मिल की महज आधे किलोमीटर की दूरी तय करने में आधे से पौन घंटा लग रहा है। 80 फीट चौड़ी सड़क पर 20 फीट तक दुकानदारों के काउंटर और ग्राहकों के वाहन कब्जा जमाए बैठे नजर आते हैं।
कहीं प्रमुख मार्ग का रास्ता बंद होने का अतिरिक्त बोझ जब किसी और एरिये पर पड़ता है, तो वहां ट्रैफिक संभालने के लिए शायद ही कोई नजर आता हो। ऊपर से कई जगह सड़क का यह हाल है कि वहां उड़ती धूल और कंकड़ दोपहिया चालकों के लिए हर दिन किसी खतरे से कम नहीं हैं।
यातायात पुलिस के पास स्वीकृत पदों में से कई पद खाली पड़े हैं। सवाल यह है कि क्या जब तक पुलिस बल पूरा नहीं होगा, तब तक शहर यूं ही जाम में घुटता रहेगा। यह भी सुझाव आया कि शहर के प्रवेश मार्गों पर स्वचालित हाइड्रोलिक बैरियर लगाकर भारी वाहनों को रोका जाए ताकि 150 के करीब पुलिसकर्मी बचाकर चौराहों पर तैनात किए जा सकें।
कागजों पर यह आइडिया बहुत अच्छा लगता है, लेकिन फाइलें जिस रफ्तार से सरकती हैं, उसे देखकर लगता है कि जिम्मेदारों को जनता के इस रोजमर्रा के मानसिक तनाव से कोई खास फर्क नहीं पड़ता।
इंदौर अब सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि वाहनों का ऐसा समंदर बन चुका है जहां हर चौराहे पर एक अनकहा युद्ध लड़ा जा रहा है। एक तरफ स्मार्ट सिटी के दावे हैं, तो दूसरी तरफ बिना समन्वय के चल रहे विभाग हैं।
एक विभाग सड़क खोदता है, दूसरा भूल जाता है, और तीसरा बैठकर सिर्फ आंकड़े गिनता है। कोर्ट ने 2019 से लंबित जनहित याचिका में भले ही विभागों के बीच एक ‹समन्वय अधिकारी› बनाने का सुझाव दिया हो, लेकिन जब तक जिम्मेदारों की इच्छाशक्ति मजबूत नहीं होगी, तब तक कोई भी जाम के मर्ज की दवा नहीं बन सकता।
शाम को जब एक थका हुआ इंदौरी अपने दफ्तर या कारखाने से या दुकान से घर लौटते वक्त किसी चौराहे पर गाड़ियों की गुत्थमगुत्था के बीच आधे घंटे तक फंसा रहता है, तो उसे कोर्ट के पन्ने या अधिकारियों के आंकड़े समझ नहीं आते।
उसे सिर्फ एक साफ रास्ता चाहिए, थोड़ा सा अनुशासन चाहिए और यह अहसास चाहिए कि इस शहर को चलाने वाला कोई जिम्मेदार भी है। लोगों का सवाल है कि कब तक हम चौराहों पर यूं ही अपनी सांसें और वक्त उलझाते रहेंगे।
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