वीडियो देखिये, निकायों में खरीदी के नाम पर बड़ा खेल: 2 लाख का कचरा वाहन 6 लाख में खरीदा; एसीएस ने पुराने वीडियो में खोली पोल
KHULASA FIRST
संवाददाता
खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मध्यप्रदेश के नगरीय निकायों में सरकारी पैसों से सामान की खरीदी को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। अपर मुख्य सचिव (ACS) संजय दुबे की नाराजगी का एक पुराना वीडियो सामने आया है, जिसमें वे निकायों में खरीदी की दरों में भारी अंतर का मुद्दा उठाते हुए नजर आते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक निकाय ने कचरा वाहन करीब 2 लाख रुपए में खरीदा, जबकि दूसरे निकाय ने वैसा ही वाहन चार डस्टबिन के साथ 6 लाख रुपए में खरीद लिया। एक ही तरह के सामान की खरीदी में इतनी बड़ी कीमत का अंतर सामने आने पर सरकारी खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता और निगरानी को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
वीडियो में संजय दुबे ने स्पष्ट किया था कि विभाग के पास खरीदी से संबंधित रिकॉर्ड मौजूद है। यदि जांच में गड़बड़ी सामने आती है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। यह वीडियो कुछ महीने पहले भौंरी स्थित शहरी विकास प्रशिक्षण संस्थान में हुई एक बैठक का बताया जा रहा है। हालांकि, यह पुरानी बैठक का वीडियो है, जिसके सामने आने के बाद नगरीय निकायों की खरीद व्यवस्था पर चर्चा तेज हो गई है।
तीन साल में 1,134 करोड़ रुपए की खरीदी, 250 करोड़ बचाने की संभावना
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मध्यप्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने तीन वर्षों के दौरान गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल के माध्यम से करीब 1,134 करोड़ रुपए की खरीदी की। रिपोर्ट में आकलन का हवाला देते हुए बताया गया है कि यदि सामान की खरीदी औसत दरों के आधार पर की जाती, तो करीब 250 करोड़ रुपए की बचत संभव थी।
यह आंकड़ा सरकारी खरीद में दरों की तुलना, लागत के आकलन और निगरानी की अहमियत को सामने लाता है। हालांकि, 250 करोड़ रुपए की संभावित बचत को वास्तविक नुकसान या प्रमाणित भ्रष्टाचार की राशि नहीं माना जा सकता। इसके लिए संबंधित खरीदारियों, वस्तुओं की गुणवत्ता, उनकी विशेषताओं और भुगतान के रिकॉर्ड की जांच जरूरी होगी।
एक जैसे सामान की कीमतों में इतना अंतर क्यों?
संजय दुबे ने कचरा वाहन की खरीदी का उदाहरण देकर बताया कि अलग-अलग निकायों में समान प्रकार के वाहन अलग-अलग कीमतों पर खरीदे गए। एक जगह वाहन की कीमत करीब 2 लाख रुपए बताई गई, जबकि दूसरी जगह चार डस्टबिन के साथ उसी तरह के वाहन के लिए 6 लाख रुपए खर्च किए गए।
इस तरह के मामलों में यह देखना जरूरी है कि दोनों वाहनों की क्षमता, निर्माण गुणवत्ता, तकनीकी विशेषताएं, डस्टबिन की लागत, परिवहन और अन्य सुविधाएं समान थीं या नहीं। यदि सभी जरूरी विशेषताएं समान होने के बावजूद कीमत में इतना अंतर है, तो संबंधित खरीद प्रक्रिया की जांच की जरूरत और बढ़ जाती है।
200 LED बल्ब 60 लाख रुपए में खरीदने की शिकायत
खरीदी में कथित अनियमितताओं को लेकर एक अन्य मामला भी सामने आया है। मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (MPSEDC) के अतिरिक्त प्रबंध निदेशक अंशुमन राज के अनुसार, वर्ष 2023 में 200 एलईडी बल्ब 60 लाख रुपए में खरीदे जाने की शिकायत मिली थी।
इस शिकायत का उल्लेख सरकारी खरीद में संभावित गड़बड़ियों की पहचान के संदर्भ में किया गया। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है कि शिकायत की जांच में क्या निष्कर्ष निकला और संबंधित खरीद में अनियमितता प्रमाणित हुई या नहीं।
AI की मदद से सामने आया सप्लायर और अनुबंधों का पैटर्न
अंशुमन राज के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से खरीद संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें एक सप्लायर से जुड़े 21 नगरीय निकायों में 201 अनुबंधों का पता चला।
डेटा विश्लेषण से इस तरह के पैटर्न सामने आने पर यह जांचने में मदद मिल सकती है कि किसी एक सप्लायर को बार-बार अनुबंध कैसे मिले, अलग-अलग निकायों में कीमतें क्या थीं और खरीद प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुरूप हुई या नहीं। हालांकि, किसी सप्लायर के कई निकायों में अनुबंध होने मात्र से भ्रष्टाचार साबित नहीं होता। इसके लिए टेंडर, प्रतिस्पर्धा, दरों और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की जांच आवश्यक है।
विभाग के पास रिकॉर्ड, गड़बड़ी मिलने पर कार्रवाई की चेतावनी
संजय दुबे के बयान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि विभाग के पास खरीद संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध होने की बात कही गई। यदि इन रिकॉर्ड का व्यवस्थित विश्लेषण किया जाए, तो अलग-अलग निकायों में समान वस्तुओं की कीमतों की तुलना करके असामान्य अंतर की पहचान की जा सकती है।
ऐसे मामलों में जांच के प्रमुख बिंदु होंगे- खरीदी गई वस्तुओं की वास्तविक कीमत, टेंडर की प्रक्रिया, सप्लायरों के बीच प्रतिस्पर्धा, सामान की गुणवत्ता, भुगतान और निर्धारित नियमों का पालन। इन पहलुओं की जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि कीमतों में अंतर के पीछे वास्तविक तकनीकी कारण थे या खरीद प्रक्रिया में कोई अनियमितता हुई।
सरकारी खजाने की बचत और जवाबदेही सबसे बड़ा सवाल
नगरीय निकायों का बजट आम जनता से जुड़े कामों पर खर्च होता है। ऐसे में खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और उचित कीमत पर सामान की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण है। यदि समान गुणवत्ता का सामान कम कीमत पर उपलब्ध हो सकता है, तो अनावश्यक अधिक खर्च से सरकारी संसाधनों पर बोझ पड़ सकता है।
अब इस पुराने वीडियो के सामने आने के बाद निगाहें इस बात पर रहेंगी कि संबंधित खरीद मामलों की जांच में क्या सामने आता है और संभावित अनियमितताओं के लिए जिम्मेदारी कैसे तय की जाती है। फिलहाल सामने आए आंकड़े और बयान खरीद व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत को रेखांकित करते हैं, जबकि भ्रष्टाचार की पुष्टि संबंधित जांच और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर ही होगी।
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