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आंख में कुछ शर्म बची है: गंभीर संकट के दौर में समीक्षा बैठक का बहिष्कार; क्या जनसेवा से बढ़कर है नेताओं का आपसी वर्चस्व

Khulasa First

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संवाददाता

16 अक्टूबर 2026, 1:10 pm
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आंख में कुछ शर्म बची है

अंतर्कलह की चौखट पर प्यासा शहर, जनता की बूंद-बूंद पर भारी पड़ा भाजपा का गुटीय घमासान

नितिन मोहन शर्मा 94250-56033, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है ताकि वे संकट के समय उनके रक्षक और प्रवक्ता बनें। जब जनप्रतिनिधि ही ऐसी समीक्षा बैठकों से किनारा कर लेते हैं तो इससे प्रशासन को भी ढिलाई बरतने का बहाना मिल जाता है।

अधिकारियों के बीच यह संदेश जाता है कि जब नेता ही गंभीर नहीं हैं, तो उन्हें जवाबदेह होने की क्या आवश्यकता है? इसका सीधा खामियाजा उस आम नागरिक को भुगतना पड़ता है जो टैक्स चुकाने के बाद भी पानी जैसी मूलभूत सुविधा के लिए तरसता है।

राजनीति में मतभेद और सांगठनिक खींचतान आम बात हो सकती है, लेकिन जब बात सीधे तौर पर लोक कल्याण और जनहित से जुड़ी हो तो सभी को अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक हितों को पीछे छोड़ना चाहिए।

इंदौर की जागरूक जनता अपने नेताओं के इस रवैये को देख रही है। यह समय आत्ममंथन का है कि क्या चुनावी रैलियों में बड़े-बड़े वादे करने वाले हमारे प्रतिनिधि संकट की घड़ी में जनता के साथ खड़े होने की बुनियादी जिम्मेदारी निभा पा रहे हैं या नहीं?

तुलसी सिलावट, गोलू शुक्ला, मालिनी गौड़, मनोज पटेल और उषा ठाकुर कल कैलाश विजयवर्गीय वाली बैठक में नही आए थे
इंदौर जैसे महानगर में जब कम बारिश के चलते आगामी महीनों में भीषण जल संकट की स्पष्ट आहट सुनाई दे रही हो, तो उम्मीद की जाती है कि शहर को इस आपदा से बचाने के लिए तमाम राजनेता अपने मतभेदों को भुलाकर एकजुट होंगे, लेकिन मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा बुलाई गई हालिया समीक्षा बैठक ने एक अलग ही कड़वी हकीकत बयां कर दी।

इस अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक में शहर के 9 भाजपा विधायकों में से 5 का अनुपस्थित रहना और खुद प्रदेश के जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट का न आना प्रशासनिक ढिलाई से ज्यादा भाजपा की आंतरिक गुटीय राजनीति और शीतयुद्ध को उजागर करता है।

राजनीतिक विश्लेषकों और स्थानीय मीडिया के अनुसार इस सामूहिक दूरी ने एक बार फिर पार्टी के भीतर जारी वर्चस्व की जंग को सार्वजनिक मंच पर ला खड़ा किया है।

इंदौर की राजनीति में गुटीय समीकरण और आंतरिक खींचतान कोई नई बात नहीं है, लेकिन चिंता तब गहरी हो जाती है जब यह राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई सीधे तौर पर लोक कल्याण के आड़े आने लगती है।

कैबिनेट मंत्री द्वारा बुलाई गई इस रणनीतिक बैठक से मालिनी गौड़, उषा ठाकुर, मनोज पटेल और स्वयं जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट जैसी प्रमुख हस्तियों का नदारद होना यह साफ संकेत देता है कि संगठन के भीतर ‘अदृश्य लकीरें’ कितनी गहरी हैं।

सिलावट का न आना इसलिए भी अधिक खटकता है, क्योंकि शहर के जल प्रबंधन का एक बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर उनके विभाग से जुड़ा है। ऐसे गंभीर विषय पर बुलाई गई बैठक से मंत्रियों और विधायकों का एक बड़ा धड़ा यदि दूरी बनाता है तो इसे केवल ‘व्यस्तता’ का नाम देकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह सीधे तौर पर शक्ति प्रदर्शन और नेतृत्व को चुनौती देने की एक राजनीतिक रणनीति प्रतीत होती है।

लोकतंत्र में जब जनप्रतिनिधि अपनी ही सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के कार्यक्रमों या समीक्षाओं का इस तरह परोक्ष बहिष्कार करने लगते हैं तो संदेश जनता के बीच कतई अच्छा नहीं जाता।

बैठक के बाद जब मीडिया ने तीखे सवाल दागे, तो कैलाश विजयवर्गीय द्वारा तल्खी से यह कहना कि ‘जिनके क्षेत्रों में पानी की कमी नहीं होगी, वे नहीं आए’, स्पष्ट करता है कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।

इस तरह के बयानों और आचरण ने विपक्ष को भी सरकार पर चौतरफा हमला करने का एक सुनहरा अवसर सौंप दिया है। कांग्रेस ने इस आंतरिक फूट को भुनाते हुए तुरंत शहर के जनप्रतिनिधियों की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर सवाल दागने शुरू कर दिए हैं।

जल संसाधन मंत्री और विधायकों की अनुपस्थिति ने खोली भाजपा की आंतरिक फूट की पोल, व्यवस्था और जनता दोनों बेहालदेख रहे हो न इंदौरियों...!

राजनीति अपनी जगह हो सकती है और पार्टी के भीतर अपने प्रभाव को बढ़ाना या बचाना राजनेताओं का पुराना स्वभाव रहा है, लेकिन जब शहर की 40 लाख की आबादी के सामने पानी की बूंद-बूंद का संकट खड़ा हो, तब इस तरह की गुटबाजी पूरी तरह से अक्षम्य हो जाती है।

इंदौर जैसे प्रगतिशील और जागरूक शहर के नागरिक अपने नेताओं से यह उम्मीद करते हैं कि वे संकट की घड़ी में ‘मेरा गुट’ और ‘तेरा गुट’ की संकीर्ण सीमाओं से बाहर निकलकर सामूहिक जिम्मेदारी निभाएं।

यह समय मध्य प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए भी आत्ममंथन का है कि क्या आपसी गुटीय संतुलन साधने के चक्कर में जनता के मूलभूत अधिकारों से समझौता होना न्यायसंगत है?

नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि चुनावी रैलियों में किए गए बड़े-बड़े वादे और विकास के दावे तब तक बेमानी हैं, जब तक कि वे संकट के समय एक जाजम पर बैठकर जनता के हितों के लिए खड़े होने का बुनियादी आचरण नहीं दिखा पाते।

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