जलसंकट की आशंका गहराने लगी: ट्यूबवेल कम पानी दे रहे; कई बोरिंग बंद हो चुके, खेती पर भी असर
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मध्यप्रदेश में मानसून की विदाई के कुछ दिन बाद ही जलसंकट की आशंका गहराने लगी है। सामान्य से कम बारिश, घटते भूजल स्तर और जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं भरने के कारण प्रदेश के 11 जिलों में आने वाले महीनों में पेयजल और सिंचाई की समस्या बढ़ सकती है। हालात इंदौर जैसे जलसंकट की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
धार में अक्टूबर से ही ट्यूबवेल कम पानी दे रहे हैं और कई बोरिंग बंद हो चुके हैं। वहीं, उज्जैन में गंभीर डैम में उपलब्ध पानी से केवल 70 दिन तक जलापूर्ति हो सकेगी। दूसरी ओर, इंदौर में भी जलस्रोतों का स्तर घटने के बाद नगर निगम ने सरकार से 50 करोड़ रुपए के पैकेज की मांग की है।
कम बारिश का असर अब केवल पेयजल व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती पर भी पड़ने लगा है। धार सहित मालवा के कई इलाकों में किसान कम पानी में होने वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।
गेहूं, लहसुन और प्याज की बोवनी का रकबा घटने की आशंका है। इससे कृषि उत्पादन प्रभावित होने के साथ खाद्यान्न की उपलब्धता और कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। इसके बावजूद जलसंकट से निपटने के लिए प्रभावित जिलों में ठोस और दीर्घकालीन तैयारी की जरूरत महसूस की जा रही है।
उज्जैन में इस बार औसतन 682 मिलीमीटर यानी करीब 27 इंच बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश का आंकड़ा 35 इंच है। कम वर्षा के कारण शहर को पेयजल उपलब्ध कराने वाला गंभीर डैम पूरी क्षमता से नहीं भर पाया।
डैम की कुल क्षमता 2,250 एमसीएफटी है, जबकि इस बार इसका जलस्तर केवल 636 एमसीएफटी तक पहुंचा। इसमें से 100 एमसीएफटी डेड स्टोरेज घटाने के बाद जलापूर्ति के लिए उपलब्ध पानी से करीब 70 दिन, यानी 22 दिसंबर तक ही सप्लाई की जा सकेगी।
उज्जैन नगर निगम के अपर आयुक्त पवन कुमार सिंह के मुताबिक, गंभीर डैम में पानी की कमी होने पर इससे पहले जून में भी नर्मदा की पाइपलाइन से पानी लेकर रोजाना जलप्रदाय किया गया था।
अब एक बार फिर नर्मदा के पानी पर निर्भरता बढ़ाने की कवायद करनी पड़ सकती है। पानी की कमी का असर शहर की सामान्य पेयजल व्यवस्था के साथ आगामी सिंहस्थ की तैयारियों पर भी पड़ने की आशंका है। ऐसे में उपलब्ध पानी का प्रबंधन और वैकल्पिक स्रोतों की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो गई है।
धार जिले में इस बार 25.84 इंच बारिश हुई, जो सामान्य से करीब 10 इंच कम है। पिछले साल जिले में औसतन 51.13 इंच बारिश दर्ज की गई थी। कम बारिश का असर अब भूजल स्तर और जलस्रोतों पर दिखने लगा है। अक्टूबर में ही कई ट्यूबवेल कम पानी दे रहे हैं, जबकि कुछ बोरिंग बंद हो चुके हैं। जो बोरिंग चल रहे हैं, उनमें भी रुक-रुककर पानी आने से सिंचाई में परेशानी हो रही है।
धार शहर की करीब डेढ़ लाख आबादी की पेयजल जरूरतें पूरी करने वाले दिलावरा, नटनागरा, नयापुरा और सीतापाट तालाबों में अब केवल 25 से 30 प्रतिशत पानी बचा है। मुंज तालाब भी लगभग 40 प्रतिशत भरा हुआ है।
जलस्रोतों में घटते पानी और बोरिंग की स्थिति को देखते हुए आने वाले महीनों में पेयजल संकट बढ़ने की आशंका है। जरूरत पड़ने पर टैंकरों से पानी मंगाना लोगों के लिए अतिरिक्त खर्च का कारण बन सकता है। किसान जिले को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग भी कर रहे हैं।
कम बारिश का असर खेती पर भी पड़ने लगा है। भारतीय किसान संघ से जुड़े किसानों का अनुमान है कि इस बार गेहूं का रकबा 75 प्रतिशत तक घट सकता है। मालवा में लहसुन और प्याज की खेती का रकबा भी करीब 70 प्रतिशत कम होने की आशंका जताई गई है। इससे उत्पादन में कमी और बाजार में कीमतें बढ़ने की चिंता है।
पर्याप्त बारिश होने पर धार और आसपास के क्षेत्रों में किसान गेहूं, लहसुन, प्याज और मटर जैसी फसलें लेते हैं। इस बार पानी की उपलब्धता को देखते हुए कई किसान चना, तिवड़ा, तुकमरी और रायड़ा जैसी कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की बुवाई कर रहे हैं।
सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलने से फसलों की बढ़वार और उत्पादन प्रभावित होने का खतरा है। यदि जलस्रोतों का स्तर इसी तरह घटता रहा, तो रबी सीजन में किसानों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
इंदौर में भी इस बार सामान्य से काफी कम बारिश हुई है। आमतौर पर करीब 37 इंच बारिश वाले शहर में इस बार केवल 23 इंच पानी बरसा। इसके चलते तालाबों में जलस्तर घटा है और आगामी गर्मी में पेयजल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। शहर में रोजाना करीब 800 एमएलडी पानी की जरूरत होती है। ऐसे में जलस्रोतों में कम पानी रहने से मांग और उपलब्धता के बीच अंतर बढ़ने की आशंका है।
छोटा बिलावली और लिंबोदी तालाब में एक फीट से भी कम पानी बचा है। पिपलियापाला तालाब में 22 फीट की क्षमता के मुकाबले जलस्तर केवल 7.6 फीट है। यशवंत सागर, बड़ा बिलावली, बड़ा सिरपुर और छोटा सिरपुर तालाबों में भी पानी की कमी बताई जा रही है।
जलसंकट की आशंका को देखते हुए महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से जल प्रबंधन के लिए 50 करोड़ रुपए का पैकेज मांगा है। इस मुद्दे पर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और तुलसी सिलावट भी बैठकें कर चुके हैं। अब चुनौती यह है कि उपलब्ध जलस्रोतों का उपयोग कितनी सावधानी से किया जाता है और गर्मी शुरू होने से पहले वैकल्पिक व्यवस्था कितनी प्रभावी ढंग से तैयार होती है।
प्रदेश के 11 जिलों में सामान्य से 80 प्रतिशत या उससे कम बारिश होने के कारण जलसंकट की आशंका जताई जा रही है। नदियों में कम पानी और बांधों के पूरी तरह नहीं भरने से पेयजल के साथ खेती के लिए भी उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। प्रभावित क्षेत्रों में सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग उठ रही है, लेकिन सबसे बड़ी जरूरत जलस्रोतों की मौजूदा स्थिति का आकलन कर समय रहते कार्ययोजना बनाने की है।
उज्जैन में पानी की सीमित उपलब्धता, धार में घटते भूजल स्तर और इंदौर में तालाबों की कम होती क्षमता संकेत दे रही है कि जल प्रबंधन को लेकर अभी से गंभीर कदम उठाने होंगे।
बारिश की कमी का असर सामने आने के बाद टैंकरों या वैकल्पिक पाइपलाइन पर निर्भर होना महंगा और सीमित समाधान साबित हो सकता है। इसलिए पेयजल के विवेकपूर्ण उपयोग, उपलब्ध जल का संरक्षण और जरूरत के मुताबिक वैकल्पिक स्रोतों की तैयारी आने वाले महीनों में निर्णायक होगी।
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