कार खरीदने का गणित बदला: पेट्रोल को मिल रही CNG; हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक कारों से चुनौती, कंपनियां भी बदल रही रणनीति
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, नई दिल्ली।
भारत में कार खरीदने वालों के सामने अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया है कि पेट्रोल कार खरीदें या डीजल।
बाजार में CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक कारों के बढ़ते विकल्पों ने ग्राहकों के फैसले को पहले से ज्यादा व्यापक बना दिया है।
कंपनियां भी बदल रहीं रणनीति
कोई कम खर्च में ज्यादा दूरी तय करना चाहता है, तो किसी की प्राथमिकता पेट्रोल पंप पर निर्भरता घटाना है।
वहीं, कुछ ग्राहक इलेक्ट्रिक कारों की ओर बढ़ रहे हैं। ग्राहकों की बदलती पसंद का असर अब वाहन कंपनियों की रणनीति पर भी दिखाई देने लगा है।
पेट्रोल और वैकल्पिक ईंधन वाली कारों के बीच अंतर अब बेहद कम
इस बदलाव का सबसे अहम संकेत सितंबर 2026 के वाहन बिक्री आंकड़ों में नजर आता है।
फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के अनुसार, सितंबर में पेट्रोल और इथेनॉल आधारित कारों की हिस्सेदारी 41.27 प्रतिशत रही।
दूसरी ओर, CNG और LPG की हिस्सेदारी 23.11 प्रतिशत, हाइब्रिड कारों की 9.44 प्रतिशत और इलेक्ट्रिक वाहनों की 8.45 प्रतिशत रही।
इन तीनों श्रेणियों को मिलाकर हिस्सेदारी 41 प्रतिशत पहुंच गई। यानी पेट्रोल और वैकल्पिक ईंधन वाली कारों के बीच अंतर अब बेहद कम रह गया है।
पेट्रोल कारों का दबदबा कायम, लेकिन चुनौती पहले से बड़ी
लंबे समय तक पेट्रोल कारें अपनी आसान उपलब्धता, परिचित तकनीक और अपेक्षाकृत सरल इस्तेमाल के कारण बड़ी संख्या में ग्राहकों की पसंद बनी रहीं।
डीजल कारों का अपना ग्राहक वर्ग रहा, खासकर लंबी दूरी और ज्यादा चलने वाले वाहनों में।
लेकिन अब CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक तकनीक ने बाजार में नए समीकरण बना दिए हैं।
सितंबर 2025 में पेट्रोल और इथेनॉल आधारित कारों की हिस्सेदारी 47.18 प्रतिशत थी, जो सितंबर 2026 में घटकर 41.27 प्रतिशत रह गई।
इसी अवधि में CNG/LPG की हिस्सेदारी 22.02 प्रतिशत से बढ़कर 23.11 प्रतिशत, हाइब्रिड की 7.30 प्रतिशत से बढ़कर 9.44 प्रतिशत और इलेक्ट्रिक कारों की 5.74 प्रतिशत से बढ़कर 8.45 प्रतिशत हो गई।
हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। अगस्त 2026 में CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक कारों की संयुक्त हिस्सेदारी 41.95 प्रतिशत थी, जो पेट्रोल की 40.85 प्रतिशत हिस्सेदारी से अधिक थी।
सितंबर में पेट्रोल मामूली अंतर से फिर आगे निकल गया। इससे स्पष्ट है कि बाजार में बदलाव की दिशा जरूर दिखाई दे रही है, लेकिन किसी एक तकनीक ने अभी निर्णायक बढ़त हासिल नहीं की है।
कंपनियों को समझ आ गया कि एक इंजन से नहीं चलेगा काम
वाहन निर्माता कंपनियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती ऐसे मॉडल तैयार करना है, जो अलग-अलग बजट, इस्तेमाल और भौगोलिक परिस्थितियों वाले ग्राहकों की जरूरतें पूरी कर सकें।
यही वजह है कि कंपनियां सिर्फ नए मॉडल उतारने के बजाय एक ही कार में अलग-अलग इंजन और पावरट्रेन विकल्प देने पर ध्यान दे रही हैं।
रेनॉ इंडिया के CEO स्टेफान देब्लेज ने माना है कि नई डस्टर के लिए सीमित इंजन विकल्पों के कारण कंपनी संभावित ग्राहकों के एक बड़े वर्ग तक नहीं पहुंच पा रही थी।
कंपनी की योजना पावरट्रेन विकल्प बढ़ाकर अपनी बाजार पहुंच में विस्तार करने की है। रेनॉ की नई डस्टर में पेट्रोल इंजन के साथ स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड विकल्प भी पेश किया गया है।
यह बदलाव बताता है कि अब किसी कार की सफलता केवल उसके डिजाइन, फीचर्स या कीमत पर निर्भर नहीं करेगी।
ग्राहक को उसी मॉडल में अपनी जरूरत के अनुरूप इंजन का विकल्प भी चाहिए। जो कंपनी यह सुविधा दे पाएगी, उसके पास अलग-अलग तरह के खरीदारों तक पहुंचने का बेहतर अवसर होगा।
मुंबई में CNG की जरूरत, दूसरे शहरों में अलग हो सकती है पसंद
भारत में कार बाजार की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है क्षेत्रीय विविधता। महानगरों, छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में वाहन इस्तेमाल करने के तरीके एक जैसे नहीं हैं।
कहीं रोजाना लंबा सफर तय करना पड़ता है, कहीं ट्रैफिक में अधिक समय गुजरता है और कहीं चार्जिंग स्टेशन या CNG पंप की उपलब्धता सीमित हो सकती है।
मुंबई जैसे शहर में CNG की अच्छी उपलब्धता और उसका उपयोग कई ग्राहकों के लिए इसे आकर्षक विकल्प बनाता है।
दूसरी ओर, जहां घर या कार्यस्थल पर चार्जिंग की सुविधा उपलब्ध है, वहां इलेक्ट्रिक कार पर विचार करना आसान हो सकता है।
हाइब्रिड कार उन लोगों को आकर्षित कर सकती है जो इलेक्ट्रिक ड्राइविंग के कुछ लाभ चाहते हैं, लेकिन पूरी तरह चार्जिंग नेटवर्क पर निर्भर नहीं होना चाहते।
इसलिए कंपनियों के लिए पूरे देश में एक ही तरह की कार बेचने की रणनीति पर्याप्त नहीं रह गई है।
उन्हें यह भी समझना होगा कि किस शहर में कौन-सा ईंधन ज्यादा व्यावहारिक है और किस ग्राहक वर्ग को किस तरह की तकनीक की जरूरत है।
महिंद्रा, स्टेलेंटिस और फॉक्सवैगन भी तलाश रहे नए रास्ते
महिंद्रा एंड महिंद्रा पेट्रोल, डीजल और इलेक्ट्रिक SUV के साथ वैकल्पिक ईंधन के क्षेत्र में भी अपने विकल्प बढ़ा रही है।
कंपनी ने XUV 3XO के CNG संस्करण के जरिए इस श्रेणी में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में कदम उठाया है।
स्टेलेंटिस भी भारत में अपने उत्पाद पोर्टफोलियो का विस्तार करने की योजना पर काम कर रही है।
कंपनी की रणनीति अलग-अलग वाहन श्रेणियों में पेट्रोल-डीजल आधारित इंजन, हाइब्रिड और बैटरी इलेक्ट्रिक विकल्प उपलब्ध कराने की है।
वहीं, स्कोडा के नेतृत्व वाला फॉक्सवैगन समूह CNG और फ्लेक्स-फ्यूल जैसी तकनीकों की संभावनाएं तलाश रहा है।
टोयोटा भी अलग-अलग तकनीकों को साथ लेकर चलने की रणनीति अपना रही है।
इसका कारण स्पष्ट है भारत में सभी ग्राहकों की आर्थिक क्षमता, वाहन चलाने की जरूरत और ईंधन की उपलब्धता समान नहीं है।
एक ही तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय कई विकल्प उपलब्ध कराने से कंपनियां अपने संभावित ग्राहक वर्ग का दायरा बढ़ा सकती हैं।
कार खरीदने से पहले इन पांच बातों का रखें ध्यान
बाजार में विकल्प बढ़ने से ग्राहकों को फायदा मिल सकता है, लेकिन सही कार चुनने के लिए केवल विज्ञापन में बताए गए माइलेज या शुरुआती कीमत पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है।
1. रोजाना कितनी दूरी तय करते हैं: यदि आपकी कार रोज लंबी दूरी तय करती है, तो ईंधन की प्रति किलोमीटर लागत का महत्व बढ़ जाता है।
2. CNG पंप या चार्जिंग स्टेशन कितनी दूर है: वैकल्पिक ईंधन का लाभ तभी व्यावहारिक होगा, जब उसकी उपलब्धता आपके नियमित रास्ते और जरूरतों के अनुरूप हो।
3. कार कितने साल चलानी है: शुरुआती कीमत के साथ सर्विस, बीमा, बैटरी या अन्य संबंधित खर्चों को भी ध्यान में रखें।
4. आपकी ड्राइविंग कैसी है: शहर के ट्रैफिक, हाईवे पर लंबी यात्रा और रोजाना कम दूरी के इस्तेमाल के लिए अलग-अलग पावरट्रेन अधिक उपयुक्त हो सकते हैं।
5. दोबारा बेचने पर क्या मिलेगा: भविष्य की रीसेल वैल्यू का अनुमान लगाना कठिन है, लेकिन लोकप्रियता, सर्विस नेटवर्क और स्थानीय मांग को समझना उपयोगी रहेगा।
आने वाले समय में मुकाबला केवल कारों का नहीं, तकनीक का भी होगा
भारतीय कार बाजार में पेट्रोल और डीजल की भूमिका फिलहाल खत्म नहीं हुई है। सितंबर 2026 के आंकड़े भी यही दिखाते हैं कि पेट्रोल और वैकल्पिक ईंधन वाली कारों के बीच मुकाबला लगभग बराबरी पर पहुंच चुका है, न कि किसी एक तकनीक का वर्चस्व स्थापित हो गया है।
आने वाले समय में कंपनियों के लिए चुनौती ऐसी कारें पेश करने की होगी, जो ग्राहकों की जरूरतों, खरीदने की क्षमता और इस्तेमाल की परिस्थितियों से मेल खाएं।
वहीं, खरीदारों के पास पहले से अधिक विकल्प होंगे, लेकिन सही फैसला लेने के लिए उन्हें अपनी वास्तविक जरूरत और कुल खर्च का हिसाब लगाना पड़ेगा।
कार खरीदने का नया नियम यही है। सबसे अच्छी कार वह नहीं, जो केवल सबसे ज्यादा माइलेज का दावा करे, बल्कि वह है जो आपकी जरूरत, बजट और रोजमर्रा के इस्तेमाल के हिसाब से सबसे बेहतर साबित हो।
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