शारदीय नवरात्रि: एक ही सूर्य चक्र में मिलेंगी दो महाशक्तियां
KHULASA FIRST
संवाददाता

19 अक्टूबर को महाअष्टमी और महानवमी का दुर्लभ महासंयोग
शक्ति साधना का परमोत्सव, नवरात्रि अनुष्ठान का सर्वोच्च सोपान और अद्भुत संयोग
भोग से मोक्ष की यात्रा, इस बार दोहरी ऊर्जा से परिपूर्ण है महाअष्टमी व महानवमी
तिथि गणित का अनोखा फेर: एक ही दिन पूजी जाएंगी मां महागौरी और सिद्धिदात्री
शक्ति साधना का महा-शिखर, महासंयोग में जब एक ही दिन पूरी होंगी भोग और मोक्ष की कामनाएं
हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सनातन संस्कृति में शारदीय नवरात्रि अथवा नवरात्र के नौ दिन साधना और आत्म-शुद्धि के पावन अवसर होते हैं, लेकिन इन नौ दिनों की यात्रा में महाअष्टमी और महानवमी का स्थान सबसे ऊंचा माना गया है।
ये केवल व्रत या उपवास के अंतिम दो दिन नहीं हैं, बल्कि यह साधक की नौ दिनों की तपस्या के 'सिद्ध होने' और 'पूर्णता प्राप्त करने' के सबसे बड़े मुकाम हैं। इस वर्ष अष्टमी और नवमी की पूजा का एक ऐसा अनूठा और पावन संयोग बन रहा है, जहां भक्त एक ही सूर्य चक्र के भीतर देवी के दोनों सर्वोच्च रूपों- मां महागौरी और मां सिद्धिदात्री की असीम अनुकंपा प्राप्त करेंगे। शास्त्रों में अष्टमी और नवमी की पूजा को अहम माना गया है। इससे जीवन में अलौकिक फल प्राप्त होते हैं।
क्यों इतनी अहम है महाअष्टमी और महानवमी की पूजा
नवरात्रि की प्रथम सात तिथियां यदि मन, शरीर और आत्मा के शोधन की प्रक्रिया हैं, तो अष्टमी और नवमी उस साधना का फल प्राप्त करने का समय हैं।
महाअष्टमी का महत्व (मां महागौरी)
अष्टमी तिथि परम पवित्रता, सौम्यता और पाप-मुक्ति की प्रतीक है। इस दिन देवी के अष्टम रूप मां महागौरी की आराधना की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी, जिससे उनका शरीर श्याम वर्ण (काला) हो गया था।
जब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन पर गंगाजल छिड़का, तब वे अति गौर (श्वेत) वर्ण की हो गईं और 'महागौरी' कहलाईं। इनकी पूजा से साधक के अंतःकरण के सारे कलुष (पाप व मैल) धुल जाते हैं। घर में सुख, शांति, समृद्धि और दांपत्य जीवन में अखंड मधुरता का वरदान मिलता है। इन्हें नारियल का भोग और श्वेत/गुलाबी रंग अत्यंत प्रिय है।
महानवमी का महत्व (मां सिद्धिदात्री)
नवमी तिथि 'पूर्णता' की प्रतीक है। इस दिन नवदुर्गा के अंतिम स्वरूप मां सिद्धिदात्री का पूजन होता है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, देवी सिद्धिदात्री साधक को आठों सिद्धियां (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) प्रदान करने वाली हैं।
देवी पुराण के हवाले से यह प्रसिद्ध लोक-मान्यता है कि स्वयं भगवान शिव ने देवी की कठिन साधना करके ये समस्त सिद्धियां प्राप्त की थीं, जिसके प्रभाव से उनका आधा शरीर देवी का हुआ और वे 'अर्धनारीश्वर' कहलाए। इनकी कृपा से व्यक्ति के कार्य क्षेत्र में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।
आठवीं शक्ति महागौरी और नौवीं सिद्धिदात्री हैं।
दुर्गा सप्तशती के बारहवें अध्याय में स्पष्ट लिखा गया है कि अष्टमी और नवमी तिथियों पर जो भक्त एकाग्र मन से देवी माहात्म्य का पाठ करता है या सुनता है, उस पर किसी भी प्रकार के पाप, दुख या आपदा का असर नहीं रहता। यही कारण है कि इन दो तिथियों पर सप्तशती पाठ और हवन का विशेष महत्व माना गया है।
दुर्लभ तिथि-संयोग: 19 अक्टूबर का अनूठा महामुहूर्त
सामान्यतः अष्टमी और नवमी दो अलग-अलग दिनों में आती हैं, लेकिन इस बार आश्विन शुक्ल अष्टमी और नवमी का महासंयोग सोमवार, 19 अक्टूबर को एक ही दिन पड़ रहा है। तिथि कोई आधी रात को बदलने वाली घड़ी नहीं है, बल्कि यह सूर्योदय और चंद्र-कलाओं की गति पर आधारित होती है।
अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर को सुबह 8:27 बजे से शुरू होकर 19 अक्टूबर को सुबह 10:51 बजे तक रहेगी। चूंकि 19 अक्टूबर का सूर्योदय अष्टमी तिथि में हो रहा है, इसलिए 'उदयातिथि' के नियमानुसार 19 अक्टूबर की सुबह महाअष्टमी मनाई जाएगी।
नवमी तिथि 19 अक्टूबर को ही सुबह 10:51 बजे के बाद नवमी तिथि लग जाएगी, जो अगले दिन (20 अक्टूबर) दोपहर 12:50 बजे तक रहेगी।
संधि काल (48 मिनट का मुहूर्त)
जिस घड़ी अष्टमी समाप्त होती है और नवमी शुरू होती है, उसे शास्त्रों में 'संधि काल' कहा गया है। 19 अक्टूबर को सुबह 10:27 बजे से 11:15 बजे तक का यह 48 मिनट का समय अत्यंत शक्तिशाली और फलदायी माना जा रहा है।
19 अक्टूबर को पूजा और अनुष्ठान का सही क्रम
इस बार एक ही दिन दोनों तिथियों का संयोग होने से साधक अपनी पूजा का क्रम इस प्रकार रख सकते हैं-
प्रातःकाल (अष्टमी पूजन): सुबह 8:29 से 10:16 बजे के बीच मां महागौरी की पूजा, शृंगार और अष्टमी का कन्या पूजन करें।
मध्याह्न पूर्व (संधि काल व नवमी आगमन): सुबह 10:51 बजे के बाद नवमी तिथि लगते ही महानवमी की पूजा, नवमी का हवन, सप्तशती की पूर्णाहुति और नवमी का कन्या पूजन करें।
चूंकि नवमी तिथि 20 अक्टूबर की दोपहर तक भी रहेगी, इसलिए जो परिवार या क्षेत्र 'पूर्ण उदयातिथि नवमी' को मानते हैं, वे 20 अक्टूबर को भी नवमी का पूजन कर सकते हैं। भक्तों को अपने कुल की रीति का पालन करना चाहिए।
कन्या पूजन का भाव: मंदिर से घर तक शक्ति का साक्षात्कार
अष्टमी या नवमी पर नौ कन्याओं और एक बालक यानी बटुक को घर बुलाकर उनके पैर धोना, तिलक लगाना, हलवा-पूरी और चने का प्रसाद खिलाकर दक्षिणा देना केवल एक कर्मकांड नहीं है। इसका वास्तविक आध्यात्मिक संदेश यह है कि हम देवी की शक्ति और पवित्रता को केवल मूर्ति या मंदिर तक सीमित न रखें, बल्कि अपने घर-परिवार और समाज की बेटियों में भी उस शक्ति का रूप देखें और उनका सम्मान करें।
19 अक्टूबर श्रद्धालुओं के लिए दोहरा सौभाग्य लेकर आ रहा है। यह एक ही सूर्य चक्र के भीतर पहले निर्मलता (महागौरी) और फिर पूर्णता (सिद्धिदात्री) को प्राप्त करने का एक अनूठा अवसर है। जैसा कि सनातन परंपरा कहती है। शक्ति पहले साधक के जीवन को शुद्ध करती है और फिर उसे सिद्धियों से पूर्ण करती है।
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