बिजली कंपनियों के कुप्रबंधन से जनता त्रस्त
KHULASA FIRST
संवाददाता

राजकुमार सिन्हा स्वतंत्र लेखक, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्य प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं की परेशानी लगातार बढ़ रही है। पहले से महंगी बिजली का भुगतान कर रहे लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने की आशंका है। एक ओर बिजली कंपनियां घाटे, कर्ज और महंगी बिजली खरीद का हवाला देती हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य में उपलब्ध अतिरिक्त बिजली को खुले बाजार में कम कीमत पर बेचे जाने के आंकड़े बिजली व्यवस्था के नियोजन और वित्तीय प्रबंधन पर सवाल खड़े करते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि बिजली कंपनियों की परिचालन संबंधी कमियों और गलत नियोजन की कीमत आम उपभोक्ता क्यों चुकाए?
टैरिफ नियमों में बदलाव से बढ़ सकता है बोझ... मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग द्वारा 1 अप्रैल से लागू होने वाले पांच वर्षों के रिटेल टैरिफ से जुड़े नियमों का मसौदा तैयार किया जा रहा है।
अभी 100 यूनिट बिजली पर 14 यूनिट तक के नुकसान की सीमा मान्य होने का उल्लेख है, जबकि नए प्रस्ताव में इसको बढ़ाकर 24.5 प्रतिशत की तैयारी बताई जा रही है यानी 100 यूनिट बिजली में से 24.5 यूनिट के नुकसान को स्वीकार्य माना जा सकता है।
यदि यह प्रस्ताव लागू किया जाता है, तो बिजली व्यवस्था में स्वीकार्य नुकसान बढ़ने के साथ लागत का सवाल भी महत्वपूर्ण होगा। अतिरिक्त नुकसान की भरपाई के लिए अधिक बिजली खरीदने की जरूरत होगी।
इसका वित्तीय असर बिजली कंपनियों के खर्च और उपभोक्ताओं के टैरिफ पर पड़ सकता है। इस बीच, 1 अप्रैल 2026 से बिजली दरों में 4.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी का बोझ भी उपभोक्ताओं पर पड़ चुका है।
अब ईंधन एवं बिजली खरीद समायोजन अधिभार यानी फ्यूल एंड पावर परचेज एडजस्टमेंट सरचार्ज (एफपीपीएएस) की दर में बदलाव किया है। 24 सितंबर से 23 अक्टूबर 2026 की अवधि के लिए इसकी दर 4.59 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.06 प्रतिशत की गई है। इससे उपभोक्ताओं के बिजली बिल पर अतिरिक्त भार पड़ने की आशंका है।
महंगी बिजली खरीदकर सस्ती क्यों बेची जा रही?... बिजली व्यवस्था में सबसे गंभीर सवाल अतिरिक्त बिजली की उपलब्धता और उसकी बिक्री से जुड़ा है। नवीन टैरिफ आदेश के अनुसार, वर्ष 2026-27 के दौरान खुले बाजार में लगभग 10,198 मिलियन यूनिट (एमयू) अतिरिक्त बिजली बेचने का अनुमान है।
इसके अलावा लगभग 899 एमयू बिजली औद्योगिक क्षेत्रों को आपूर्ति की जाएगी। इस तरह नियोजित अतिरिक्त बिक्री करीब 11,100 एमयू होगी। व्यवस्था में उपलब्ध कुल अतिरिक्त बिजली 20,000 एमयू से अधिक होने का अनुमान बताया गया है।
इसका अर्थ है राज्य में उपलब्ध बिजली का एक बड़ा हिस्सा घरेलू, औद्योगिक या अन्य जरूरतों में इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है और उसे दूसरे खरीदारों को बेचना पड़ रहा है।
मध्य प्रदेश में अतिरिक्त बिजली लगभग 3.81 रुपए प्रति यूनिट बेची जा रही है, जबकि उपभोक्ताओं से बिजली की दरें करीब 7 से 8 रुपए प्रति यूनिट तक वसूली जा रही हैं। इन दोनों दरों की तुलना बिजली व्यवस्था की पूरी लागत का हिसाब नहीं बताती, क्योंकि खरीद लागत, बिजली के प्रकार, अनुबंध और अन्य शुल्क अलग-अलग हो सकते हैं।
फिर भी, यदि महंगी दरों पर खरीदी गई बिजली का उपयोग नहीं हो पाता और उसे काफी कम कीमत पर बेचना पड़ता है, तो खरीद-बिक्री के अंतर से होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी तय करना जरूरी है।
मध्य प्रदेश जेनको के सेवानिवृत्त अतिरिक्त मुख्य अभियंता राजेंद्र अग्रवाल ने इस स्थिति को बिजली नियोजन की कमजोरी से जोड़ते हुए कहा है कि बिजली ऊंची कीमत पर खरीदी जाती है, लेकिन उपयोग नहीं होने पर उसे कम दर पर बेचना पड़ता है। उनके अनुसार, इस अंतर का वित्तीय बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यदि बिजली की मांग का आकलन सही तरीके से किया जाता, तो क्या इतनी बड़ी मात्रा में अतिरिक्त बिजली खरीदने या उपलब्ध रखने की जरूरत पड़ती?
क्या बिजली खरीदने के समय भविष्य की वास्तविक मांग, मौसमी बदलाव और बाजार की परिस्थितियों का पर्याप्त अध्ययन किया गया था? इन सवालों का जवाब पारदर्शी आंकड़ों और स्वतंत्र समीक्षा से ही मिल सकता है।
ट्रांसमिशन व वितरण हानियां भी बड़ा सवाल... बिजली उत्पादन केंद्र से उपभोक्ता तक पहुंचने के दौरान तकनीकी और अन्य कारणों से होने वाली ट्रांसमिशन एवं वितरण हानियां भी बिजली की प्रभावी लागत बढ़ाती हैं।
पुराने नेटवर्क, ट्रांसफार्मरों पर दबाव, लाइन लॉस, बिजली चोरी और वितरण व्यवस्था की कमजोरियों को दूर किए बिना केवल बिजली दरें बढ़ाना स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
बिजली कंपनियों की परिचालन दक्षता जितनी कमजोर होगी, प्रति यूनिट बिजली की प्रभावी लागत उतनी ही बढ़ सकती है। इसलिए टैरिफ तय करते समय यह स्पष्ट होना चाहिए कि कंपनियों का कितना खर्च अपरिहार्य है और कितना खर्च प्रबंधन की कमियों, तकनीकी अक्षमताओं या खराब नियोजन के कारण पैदा हुआ है।
बिजली कंपनियों के घाटे और कर्ज का प्रश्न भी इसी से जुड़ा है। आय और व्यय के बीच अंतर बढ़ने पर कंपनियों को उधार लेना पड़ सकता है। कर्ज पर ब्याज का भुगतान भी करना होता है, जिसका असर बिजली की लागत पर पड़ सकता है। यदि परिचालन संबंधी कमियों की समीक्षा किए बिना लगातार बढ़ते खर्च को टैरिफ में शामिल किया जाता है, तो उपभोक्ताओं पर दोहरा बोझ पड़ सकता है।
अब जवाबदेही तय करने का समय... बिजली व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार और नियामक संस्था को बुनियादी सवालों के जवाब देने होंगे। बिजली कंपनियों की वित्तीय और तकनीकी कार्यप्रणाली की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए।
महंगे बिजली खरीद समझौतों की शर्तों और लागत का पारदर्शी आकलन किया जाए। अतिरिक्त बिजली की खरीद, उपयोग और बिक्री का हिसाब सार्वजनिक किया जाए। ट्रांसमिशन एवं वितरण हानियों को कम करने के लिए समयबद्ध योजना बनाई जाए।
इसके साथ ही बिजली दरों में बढ़ोतरी से पहले यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि कंपनियों के घाटे के पीछे वास्तविक लागत कितनी है और कुप्रबंधन की भूमिका कितनी है। उपभोक्ताओं को यह जानने का अधिकार है कि उनसे वसूली जाने वाली राशि का उपयोग किस मद में हो रहा है और बिजली की उपलब्धता के बावजूद अतिरिक्त बिजली बेचने की नौबत क्यों आ रही है।
मध्यप्रदेश में एक तरफ 20,000 एमयू से अधिक अतिरिक्त बिजली उपलब्ध होने का अनुमान है, दूसरी तरफ लगभग 11,100 एमयू बिजली की नियोजित अतिरिक्त बिक्री का उल्लेख है।
इसके साथ ही बिजली दरों में बढ़ोतरी और एफपीपीएएस में बदलाव की स्थिति भी सामने है। ये तथ्य बिजली कंपनियों की योजना, खरीद नीति और वित्तीय प्रबंधन की विस्तृत समीक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाना तभी सार्थक है, जब उपलब्ध बिजली का उपयोग उचित योजना और उचित लागत के साथ हो। बिजली कंपनियों का घाटा, कर्ज, ब्याज, महंगे खरीद समझौते और वितरण संबंधी अक्षमताएं बिना समीक्षा के उपभोक्ताओं के बिल में जोड़ते रहना न्यायसंगत नहीं है।
महंगे बिजली खरीद समझौतों की समीक्षा जरूरी
बिजली कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर महंगे बिजली खरीद समझौतों का भी असर पड़ सकता है। बिजली की मांग और उपलब्धता समय के साथ बदलती रहती है। ऐसे में यदि लंबे समय के लिए महंगी दरों पर बिजली खरीदने के समझौते होते हैं और बाद में मांग कम हो जाती है, तो अतिरिक्त बिजली को कम कीमत पर बेचने की स्थिति बन सकती है।
इसलिए बिजली नीति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि राज्य में कितनी बिजली उत्पादन क्षमता उपलब्ध है। यह भी देखना जरूरी है कि बिजली किस कीमत पर खरीदी जा रही है, उसकी वास्तविक आवश्यकता कितनी है, समझौतों की शर्तें क्या हैं और अतिरिक्त बिजली की बिक्री से कितना वित्तीय अंतर पैदा हो रहा है।
बिजली खरीद समझौतों की पारदर्शी समीक्षा, वास्तविक मांग का वैज्ञानिक आकलन और भविष्य की जरूरतों का स्वतंत्र मूल्यांकन समय की मांग है। यदि किसी समझौते के कारण अनावश्यक वित्तीय बोझ पैदा हो रहा है, तो उसके कारणों और जिम्मेदारी को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
सब्सिडी राहत है, लेकिन जवाबदेही का विकल्प नहीं
राज्य सरकार के अनुसार, मध्यप्रदेश के लगभग 1.9 करोड़ बिजली उपभोक्ताओं में से करीब 1.4 करोड़ को सब्सिडी से राहत मिलती है। इसमें विशेष रूप से 150 यूनिट प्रतिमाह तक बिजली का उपयोग करने वाले उपभोक्ता शामिल हैं।
यह सहायता निश्चित रूप से पात्र परिवारों को राहत देती है, लेकिन सब्सिडी का भुगतान भी सरकारी बजट से होता है। सरकारी बजट में उपलब्ध संसाधन अंततः करों और सार्वजनिक धन से आते हैं, इसलिए सब्सिडी से उपभोक्ता को मिलने वाली राहत महत्वपूर्ण होने के बावजूद बिजली व्यवस्था की वास्तविक लागत और कंपनियों की दक्षता से जुड़े सवाल समाप्त नहीं हो जाते।
यदि बिजली कंपनियों की अक्षमता के कारण घाटा बढ़ता है और उसकी भरपाई सरकारी सहायता से की जाती है, तो उसका आर्थिक प्रभाव व्यापक रूप से जनता पर ही पड़ता है। महंगी बिजली का असर केवल घरेलू उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहता।
उद्योगों, छोटे व्यापारियों, कृषि और सेवा क्षेत्र की लागत भी इससे प्रभावित होती है। घरेलू परिवारों का मासिक बजट बिगड़ता है, जबकि छोटे व्यवसायों और उद्योगों के लिए उत्पादन लागत बढ़ने से निवेश, रोजगार और वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
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