संगठन, साहस और न्याय के पक्ष में निर्णायक संकल्प: शारदीय नवरात्रि; षष्ठम दिवस, मां कात्यायनी का संदेश
KHULASA FIRST
संवाददाता

राजकुमार जैन स्वतंत्र लेखक, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
समाज का पतन केवल आक्रान्ताओं के अत्याचारों से नहीं होता; बल्कि वह सज्जनों की निष्क्रियता से भी होता है। अन्याय करने वाला व्यक्ति अपनी सीमा जानता है, लेकिन अन्याय देखकर भी मौन रहने वाला समाज अपनी नैतिक शक्ति खोने लगता है।
आज जब सत्य और असत्य के बीच की रेखाएँ धुँधली हो रही हैं, तब नवरात्रि के षष्ठ दिवस माँ कात्यायनी का स्वरूप हमें केवल आराधना नहीं, बल्कि आत्मपरीक्षण और कर्म का संदेश देता है। प्रश्न यह नहीं कि हम किसकी पूजा करते हैं; प्रश्न यह है कि संकट की घड़ी में हम किसके पक्ष में खड़े होते हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, महिषासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए देवताओं की सम्मिलित शक्ति से माँ कात्यायनी का प्राकट्य हुआ। उन्होंने महिषासुर का संहार कर धर्म की पुनर्स्थापना की।
इस आख्यान का मर्म स्पष्ट है कि जब अन्याय संगठित हो जाए, तब न्याय की रक्षा के लिए बिखरी हुई सदाशयता पर्याप्त नहीं होती; उसे साहस, संकल्प और सामूहिक प्रयास का स्वरूप देना पड़ता है।
देवी कात्यायनी की स्तुति में कहा गया है:
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥
सिंह पर आरूढ़ माँ कात्यायनी के हाथों में सुशोभित तलवार अन्याय के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई का प्रतीक है, कमल निर्मल विवेक का और अभय मुद्रा निर्भयता का संदेश देती है। इन प्रतीकों का समन्वय सिखाता है कि साहस विवेकहीन आक्रामकता नहीं, बल्कि उचित उद्देश्य के लिए सही समय पर उठाया गया दृढ़ कदम है।
युवाओं के लिए इस स्वरूप की तीन प्रमुख शिक्षाएँ हैं।
पहली: व्यक्तिगत प्रतिभा को सामूहिक शक्ति में बदलें। कोई भी बड़ा सामाजिक परिवर्तन केवल एक व्यक्ति के उत्साह से स्थायी नहीं बनता। संगठन तभी प्रभावी होता है, जब अहंकार के स्थान पर उद्देश्य और प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग प्रतिष्ठित हो। चाहे सामाजिक सुधार हो, उद्यमिता हो अथवा राष्ट्रनिर्माण, विविध क्षमताओं को एक दिशा देना ही नेतृत्व की असली कसौटी है।
दूसरी: तटस्थता और विवेक में अंतर पहचानें। हर विवाद में कूदना साहस नहीं, लेकिन सत्य से सामना होने पर सुविधाजनक चुप्पी साध लेना भी विवेक नहीं। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना, पीड़ित का साथ देना और गलत आचरण का प्रमाणसम्मत विरोध करना नागरिक उत्तरदायित्व है। विरोध की भाषा मर्यादित हो सकती है, पर न्याय के प्रति प्रतिबद्धता कमजोर नहीं होनी चाहिए।
तीसरी: विचार को निर्णय और निर्णय को कर्म में बदलें। अनंत आशंकाएँ, असफलता का भय और लगातार टालमटोल अवसरों को निष्प्रभावी कर देते हैं। माँ कात्यायनी की तलवार स्मरण कराती है कि उचित विचार के बाद निर्णय आवश्यक है। जहाँ तथ्य स्पष्ट हों और उद्देश्य न्यायसंगत हो, वहाँ साहसपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए, बिना आवेश के, लेकिन बिना अनावश्यक संकोच के।
आज आक्रोश व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया उपलब्ध है, पर समाज का चरित्र टिप्पणियों से नहीं, कर्मों से बदलता है। किसी कमजोर व्यक्ति की सहायता करना, संस्थागत अनियमितता के विरुद्ध वैधानिक कदम उठाना, अन्याय के शिकार व्यक्ति को समर्थन देना और सकारात्मक पहलों में लोगों को जोड़ना। —ये ऐसे प्रयास हैं जिनसे परिवर्तन धरातल पर उतरता है।
इस षष्ठी पर संकल्प लें कि हमारी भक्ति केवल दीप, धूप और मंत्र तक सीमित नहीं रहेगी। हम शक्ति को सेवा, साहस को उत्तरदायित्व और संगठन को लोककल्याण का माध्यम बनाएँगे।
क्योंकि अन्याय की सबसे बड़ी ढाल अत्याचारी की तलवार नहीं, बल्कि समाज की वह चुप्पी है जो सत्य को अकेला छोड़ देती है। माँ कात्यायनी की आराधना तभी सार्थक होगी, जब हम उस चुप्पी को तोड़ने का नैतिक साहस जुटाएँगे।
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