धूल का बढ़ता गुबार बना मुसीबत का कारण: निर्माण कार्य और बदहाल सड़कों से फजीहत; वायु गुणवत्ता को लेकर चिंता में इजाफा
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर में जगह-जगह चल रहे निर्माण कार्यों, खुदी हुई सड़कों और गड्ढों के कारण उड़ती धूल अब लोगों की सेहत पर भारी पड़ने लगी है। दिन हो या रात, कई इलाकों में धूल का गुबार उड़ता रहता है। इसका असर लोगों के श्वसन स्वास्थ्य पर दिखाई देने लगा है।
खांसी, गले में जलन, सांस फूलने और एलर्जी जैसी समस्याओं से परेशान मरीजों की संख्या में करीब 10 प्रतिशत तक वृद्धि होने की बात सामने आई है। महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय (एमजीएम मेडिकल कॉलेज) के श्वसन रोग विभाग की ओपीडी में भी मरीजों की संख्या बढ़ने की जानकारी दी गई है।
हवा में धूल के महीन कणों की बढ़ती मात्रा ने शहर की वायु गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ा दी है। खासकर उन लोगों को अधिक परेशानी हो रही है, जिन्हें पहले से अस्थमा, सांस की बीमारी या किसी प्रकार की एलर्जी है। सड़क पर रोजाना सफर करने वाले दोपहिया वाहन चालक भी धूल के सीधे संपर्क में आने के कारण प्रभावित हो रहे हैं।
इंदौर में वायु प्रदूषण से जुड़ा वार्षिक आंकड़ा भी चिंता बढ़ाने वाला है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023-24 में शहर में PM-10 का वार्षिक औसत स्तर 99 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया था। वर्ष 2024-25 में यह बढ़कर 108 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो गया। यानी एक साल के भीतर PM-10 के स्तर में लगभग 9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
PM-10 ऐसे कण होते हैं, जिनका आकार 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। निर्माण स्थलों, सड़कों की धूल, वाहनों की आवाजाही और अन्य गतिविधियों से ये कण हवा में फैल सकते हैं। सांस के साथ शरीर में प्रवेश करने पर ये श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति में बीमारी बढ़ने के पीछे प्रदूषण के अलावा अन्य कारण भी हो सकते हैं।
शहर में सड़क निर्माण, मरम्मत और अन्य विकास कार्यों के दौरान धूल पर नियंत्रण रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है। कई जगह सड़कें खोदने के बाद लंबे समय तक व्यवस्थित तरीके से मरम्मत नहीं होने या सतह पर मिट्टी और निर्माण सामग्री जमा रहने से वाहनों के गुजरते ही धूल उड़ने लगती है।
निर्माण स्थलों पर पर्याप्त पानी का छिड़काव नहीं होने, सामग्री को ढककर नहीं रखने और मलबे का समय पर निपटान नहीं होने से भी धूल आसपास के रिहायशी इलाकों तक पहुंच सकती है। व्यस्त सड़कों पर लगातार वाहनों की आवाजाही इस समस्या को और बढ़ा देती है।
इसका असर केवल सड़क से गुजरने वालों पर ही नहीं, बल्कि आसपास रहने वाले परिवारों, दुकानदारों, राहगीरों और खुले में काम करने वाले लोगों पर भी पड़ सकता है। जिन इलाकों में निर्माण कार्य लंबे समय तक चलते हैं, वहां लोगों को बार-बार धूल के संपर्क में आने की परेशानी झेलनी पड़ती है।
हवा में धूल के कण बढ़ने से लोगों को कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं। इनमें लगातार खांसी आना, गले में खराश या जलन, नाक में खुजली, छींकें आना, आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी शामिल हैं। पहले से अस्थमा या एलर्जी से पीड़ित लोगों में लक्षण अधिक गंभीर हो सकते हैं।
एमजीएम मेडिकल कॉलेज के श्वसन रोग विभाग की ओपीडी में मरीजों की संख्या बढ़ने की जानकारी इस समस्या की गंभीरता की ओर ध्यान दिलाती है। हालांकि, मरीजों की संख्या में करीब 10 प्रतिशत वृद्धि के दावे की पुष्टि के लिए संबंधित अवधि के ओपीडी रिकॉर्ड और तुलनात्मक आंकड़ों की जरूरत होगी। बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को प्रदूषित हवा से विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। लगातार धूल के संपर्क में रहने से उनकी परेशानी बढ़ सकती है।
इंदौर में रोजाना बड़ी संख्या में लोग दोपहिया वाहनों से आवागमन करते हैं। सड़क किनारे उड़ती धूल और आगे चल रहे वाहनों से उठने वाले कण सीधे उनके संपर्क में आते हैं। लंबे समय तक यातायात में रहने वाले लोगों के लिए यह परेशानी अधिक हो सकती है।
हेलमेट पहनने के बावजूद चेहरे और आंखों तक धूल पहुंच सकती है। ऐसे में जरूरत के अनुसार अच्छी तरह फिट होने वाला, कणों को छानने में सक्षम मास्क पहनना मददगार हो सकता है। आंखों की सुरक्षा के लिए उपयुक्त चश्मे का इस्तेमाल भी उपयोगी है। हालांकि, मास्क प्रदूषण के सभी जोखिमों को समाप्त नहीं करता।
शहर में धूल की समस्या को कम करने के लिए निर्माण एजेंसियों और संबंधित विभागों को नियमित निगरानी के साथ प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। निर्माण स्थलों पर पानी का छिड़काव, निर्माण सामग्री को ढककर रखना, मलबे का समय पर परिवहन और सड़कों की नियमित सफाई जैसे उपाय धूल के फैलाव को कम कर सकते हैं।
खुदाई के बाद सड़कों की समयबद्ध मरम्मत, खुले में मिट्टी और रेत जमा करने पर नियंत्रण तथा धूल अधिक उड़ने वाले क्षेत्रों की पहचान भी जरूरी है। केवल सफाई अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा; यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि काम पूरा होने के बाद सड़कें व्यवस्थित स्थिति में हों और दोबारा धूल न उड़ने लगे।
वहीं, वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों के आंकड़ों का नियमित विश्लेषण कर उन इलाकों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, जहां प्रदूषण का स्तर लगातार अधिक रहता है। नागरिकों की शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई से भी समस्या को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
धूल और प्रदूषण के संपर्क को कम करने के लिए लोगों को कुछ सावधानियां अपनानी चाहिए। धूल अधिक उड़ने वाले रास्तों से यथासंभव बचें, घरों की खिड़कियां जरूरत के अनुसार बंद रखें और घर में धूल जमा होने पर गीले कपड़े से सफाई करें।
बाहर निकलते समय उपयुक्त मास्क का इस्तेमाल करें, खासकर निर्माण स्थलों और अधिक यातायात वाले मार्गों पर। यदि लगातार खांसी, सांस फूलने, सीने में जकड़न या एलर्जी की शिकायत हो, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। सांस लेने में गंभीर परेशानी होने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
इंदौर में विकास कार्य शहर की आधारभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए जरूरी हैं, लेकिन इनके कारण नागरिकों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। PM-10 के वार्षिक औसत में वृद्धि और श्वसन संबंधी शिकायतों के बढ़ने की जानकारी शहर में धूल नियंत्रण के उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है।
अब जरूरत इस बात की है कि निर्माण कार्यों के साथ धूल नियंत्रण को भी प्राथमिकता दी जाए। सड़कों की समय पर मरम्मत, निर्माण स्थलों पर नियमों का पालन और प्रदूषण की नियमित निगरानी से ही लोगों को राहत मिल सकती है। स्वच्छ शहर की पहचान केवल साफ सड़कों से नहीं, बल्कि ऐसी हवा से भी होती है जिसमें नागरिक बिना परेशानी के सांस ले सकें।
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