21,00 करोड़ की नर्मदा-मालवा-गंभीर परियोजना में मजदूरों का शोषण: श्रम विभाग भी संदेह के घेरे में- अधिकारियों की संपत्ति जांच की मांग; ‘घेराव-डेरा डालो’ आंदोलन की चेतावनी
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
लगभग 2,100 करोड़ रुपए की महत्वाकांक्षी नर्मदा-मालवा-गंभीर लिफ्ट सिंचाई परियोजना में कर्मचारियों के कथित शोषण का मामला श्रम विभाग पर उठते सवालों के कारण गंभीर हो गया है।
परियोजना के ऑपरेशन एवं मेंटेनेंस का ठेका लेने वाली चेन्नई की कंपनी पॉवर लिंकर पर कर्मचारियों के वेतन और वैधानिक सुविधाओं का भुगतान नहीं करने का आरोप है। श्रमिकों का कहना है श्रम विभाग के चक्कर लगाने के बावजूद राहत नहीं मिली और मामला श्रम न्यायालय, खंडवा भेज दिया गया।
कर्मचारियों ने श्रम विभाग के कुछ अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कंपनी को कथित तौर पर फायदा पहुंचाने के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है शिकायतों की जांच और कार्रवाई के बावजूद बकाया भुगतान नहीं कराया गया।
संबंधित अधिकारियों की संपत्ति और सेवा रिकॉर्ड की जांच की मांग कर श्रम विभाग के कार्यालय पर ‘घेराव-डेरा डालो’ आंदोलन की चेतावनी दी है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और विभागीय रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है। श्रम विभाग तथा पावर लिंकर कंपनी का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी जरूरी है।
34 महीने पीएफ, ईएसआईसी, ओवरटाइम और बोनस से वंचित रखने का आरोप... कर्मचारियों के अनुसार, पॉवर लिंकर ने 1 जून 2023 को परियोजना के ऑपरेशन एवं मेंटेनेंस का ठेका संभाला था।
लगभग 34 महीने उन्हें पीएफ, ईएसआईसी, ओवरटाइम, बोनस, सरकारी अवकाश और वर्ष 2024 से राज्य शासन द्वारा बढ़ाई गई मजदूरी के एरियर जैसी सुविधाओं का लाभ नहीं मिला। कंपनी ने कई बार तीन से चार महीने के अंतराल में वेतन दिया। जनवरी से अप्रैल 2026 तक का वेतन भी बकाया है।
भारतीय मजदूर संघ द्वारा मामला उठाए जाने के बाद 1 मई 2026 से आठ घंटे की ड्यूटी तथा पीएफ, ईएसआईसी, ओवरटाइम और बोनस संबंधी व्यवस्था लागू की गईं, लेकिन पुरानी टेंडर अवधि के बकाया भुगतान का विवाद अनसुलझा है।
कार्रवाई हुई, लेकिन भुगतान नहीं मिला... श्रमिकों के अनुसार उन्होंने अपनी मांगों को लेकर पॉवर लिंकर के प्रोजेक्ट मैनेजर मनोज मेहरा और एनवीडीए के कार्यपालन यंत्री शिवहरे को आवेदन दिए।
एसडीएम, कलेक्टर और श्रम अधिकारियों से भी शिकायतें कीं। श्रम विभाग खरगोन में करीब पांच महीने चक्कर लगाने के बाद भी राहत नहीं मिली। मामला श्रम आयुक्त, इंदौर के समक्ष भी उठाया गया। इसके बावजूद बकाया भुगतान नहीं हुआ और प्रकरण श्रम न्यायालय खंडवा भेज दिया गया।
कर्मचारियों का आरोप है सीएम हेल्पलाइन पर भी शिकायत की गई, जो उनके मुताबिक एल-4 स्तर तक पहुंचने के बाद बंद कर दी गई। सवाल है इतने स्तरों पर शिकायत के बाद भी समाधान क्यों नहीं हुआ?
कंपनी ने पक्ष नहीं रखा, फिर भी मामला कोर्ट भेजा... श्रमिकों का आरोप है श्रम विभाग ने शिकायत पर प्रकरण बनाया और कंपनी को अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस दिए, लेकिन उसने निर्धारित प्रक्रिया में जवाब नहीं दिया।
ऐसी स्थिति मंक विभाग को उपलब्ध दस्तावेजों और लागू नियमों के आधार पर प्रभावी कार्रवाई करना चाहिए थी तथा बकाया दिलाने के लिए ठोस कदम उठाना चाहिए थे। कंपनी बार-बार नोटिस दिए जाने के बावजूद अपना पक्ष रखने के लिए उपस्थित नहीं हुई, तो विभाग ने आगे क्या कार्रवाई की?
कंपनी की अनुपस्थिति दर्ज की गई? क्या एकतरफा कार्रवाई की संभावना पर विचार किया गया? और बकाया वेतन व अन्य देयकों के भुगतान के लिए कौन-से कदम उठाए गए?
श्रमिकों का यह भी आरोप है विभाग के कुछ अधिकारियों ने नियमों का हवाला देकर मामले को श्रम न्यायालय खंडवा भेज दिया, जबकि समझौते अथवा विभागीय स्तर पर उपलब्ध वैधानिक प्रक्रिया से समाधान का प्रयास किया जा सकता था।
हालांकि, किसी कंपनी के उपस्थित नहीं होने मात्र से हर मामले में विभाग द्वारा सीधे भुगतान का आदेश देना अनिवार्य नहीं हो जाता। इस बात पर निर्भर करता है शिकायत किस कानून के तहत दर्ज हुई, प्रकरण किस प्रकृति का था और संबंधित अधिकारी के पास कौन-सी वैधानिक शक्तियां थीं। इसलिए विभागीय रिकॉर्ड और प्रकरण की वास्तविक स्थिति की जांच महत्वपूर्ण है।
कोर्ट में मामला लंबा खिंचने का अंदेशा... श्रमिकों का कहना है लंबे समय से वेतन और अन्य देयकों का इंतजार कर रहे गरीब कर्मचारियों के लिए न्यायिक प्रक्रिया का लंबा खिंचना संकट बढ़ा सकता है।
मामला वर्षों चलता रहा और आगे अपील की प्रक्रिया भी शुरू हुई, तो कर्मचारियों को अपनी मेहनत की कमाई पाने के लिए लगातार कानूनी खर्च और आने-जाने का बोझ उठाना पड़ सकता है।
लंबी कानूनी प्रक्रिया का फायदा कंपनी को मिल सकता है, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर कर्मचारी परेशान होते रहेंगे। हालांकि, कंपनी ने जानबूझकर भुगतान रोके रखने या किसी षड्यंत्र में शामिल होने के आरोपों पर अपना पक्ष सार्वजनिक रूप से रखा है या नहीं, इसकी पुष्टि आवश्यक है।
श्रम निरीक्षक भगवान कृष्ण का क्या कहना है?... श्रमिकों द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, श्रम निरीक्षक भगवान कृष्ण का कहना है नियमानुसार प्रकरण को न्यायालय में प्रस्तुत किया है। कर्मचारियों का तर्क है एकतरफा कार्रवाई की संभावना पर भी विचार किया जाना चाहिए था।
इस मुद्दे पर विभाग को स्पष्ट करना चाहहिए प्रकरण किस कानूनी प्रावधान के तहत श्रम न्यायालय खंडवा भेजा गया, इसके पूर्व कंपनी को कितने नोटिस दिए गए, उनकी तामील हुई या नहीं और कंपनी की अनुपस्थिति में क्या कार्रवाई की गई।
साथ ही विभागीय अधिकारियों ने समझौते, बकाया राशि की गणना और श्रमिकों को राहत दिलाने के लिए कौन-से विकल्प अपनाए, यह भी सार्वजनिक होना चाहिए।
संबंधित अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए... श्रमिकों ने श्रम विभाग के कुछ अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाते हुए उनकी संपत्ति और सेवा रिकॉर्ड की जांच की मांग उठाई है। उनका कहना है शिकायतों के बावजूद उन्हें न्याय नहीं मिला और कंपनी के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो संबंधित अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
इसी मांग को लेकर श्रमिकों ने श्रम विभाग के कार्यालय पर ‘घेराव-डेरा डालो’ आंदोलन करने की चेतावनी दी है। आंदोलन की तारीख और कार्यक्रम की अभी नहीं दी है। श्रमिकों की मांग है जांच में पता लगाया जाए शिकायतों पर कार्रवाई किस स्तर पर रुकी, कंपनी को नोटिस दिए जाने के बाद क्या कदम उठाए गए, प्रकरण न्यायालय में भेजने का आधार क्या था और कर्मचारियों के बकाया भुगतान के लिए विभाग ने क्या प्रयास किए।
203 कर्मचारियों की जगह 60 से 70 लोगों से काम कराने का आरोप... विवाद केवल वेतन तक सीमित नहीं है। कर्मचारियों का दावा है टेंडर के अनुसार परियोजना में लगभग 203 कर्मचारियों की आवश्यकता है, जबकि करीब 60 से 70 कर्मचारियों से काम कराया जा रहा है।
पंप हाउस, पॉवर ग्रिड और पाइप लाइन के नियमित रखरखाव में भी लापरवाही बरती जा रही है। इन दावों की पुष्टि टेंडर की शर्तों, स्वीकृत कर्मचारी संख्या, उपस्थिति रजिस्टर, वेतन रिकॉर्ड, रखरखाव लॉगबुक और स्वतंत्र तकनीकी निरीक्षण से हो सकती है।
50 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि और किसानों के हितों का सवाल... नर्मदा-मालवा-गंभीर परियोजना का उद्देश्य मालवा में सिंचाई सुविधा का विस्तार करना है। कर्मचारियों के अनुसार, इंदौर और उज्जैन क्षेत्र की छह तहसीलों में लगभग 50 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को पर्याप्त पानी उपलब्ध कराने से जुड़ी इस परियोजना में किसानों को अपेक्षित जल नहीं मिल पा रहा है।
कर्मचारियों की कमी और रखरखाव में लापरवाही के आरोप सही पाए जाते हैं, तो परियोजना की कार्यक्षमता और किसानों को मिलने वाली सिंचाई सुविधा प्रभावित हो सकती है। इसीलिए मामले की जांच सिर्फ श्रमिकों के भुगतान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि परियोजना के संचालन, तकनीकी रखरखाव और जल आपूर्ति की स्थिति की भी समीक्षा होनी चाहिए।
एनवीडीए, श्रम विभाग और कंपनी से जवाब जरूरी
इस महत्वपूर्ण परियोजना में उठे आरोपों के
बीच कुछ सवालों के जवाब जरूरी हैं-
पुराने टेंडर अवधि के दौरान कर्मचारियों के वेतन और वैधानिक सुविधाओं का भुगतान हुआ या नहीं? श्रमिकों की शिकायतों पर कंपनी को कितने नोटिस दिए गए और उनका क्या जवाब मिला?
मामला श्रम न्यायालय, खंडवा भेजने का कानूनी आधार क्या था? सीएम हेल्पलाइन की शिकायत किस आधार पर बंद की गई? स्वीकृत कर्मचारी संख्या और वास्तविक तैनाती में अंतर है या नहीं?
परियोजना के रखरखाव और किसानों को पानी की आपूर्ति की स्वतंत्र जांच कब होगी? अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच और श्रमिकों के बकाया भुगतान पर निर्णय कब होगा?
अब जरूरी है एनवीडीए, श्रम विभाग और जिला प्रशासन निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करें। पॉवर लिंकर कंपनी और संबंधित अधिकारियों का पक्ष भी सामने आना चाहिए।
यदि कर्मचारियों के बकाया और श्रम कानूनों के उल्लंघन के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय कर श्रमिकों को उनका वैधानिक हक दिलाया जाए।
आखिर सवाल है—
अपने पसीने की कमाई के लिए सरकारी कार्यालयों से लेकर न्यायालय तक भटक रहे श्रमिकों को राहत कब मिलेगी, और करोड़ों रुपये की सार्वजनिक परियोजना में जवाबदेही सुनिश्चित कौन करेगा?
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