सिटी पब्लिक स्कूल पर कसेगा कानूनी शिकंजा: अवैध वसूली पर राजीनामा नहीं; आपराधिक धाराओं में हो कार्रवाई
KHULASA FIRST
संवाददाता

दस हजार का चेक थमाकर गुनाह छिपाने के खेल का खुलासा
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम की जिम्मेदारी शिक्षा विभाग की है, पर विभाग की कार्यशैली अब सवालों के घेरे में है। नगीन नगर के सिटी पब्लिक स्कूल में कक्षा पांचवी बोर्ड परीक्षा फीस के नाम पर 1850 रुपए वसूलने के आरोप और विरोध के बाद दो बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की शिकायत के मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कार्रवाई करनी थी या सिर्फ रकम लौटवाकर मामला निपटाना था?
स्कूल प्रबंधन ने करीब 10 हजार रुपए लौटाए, लेकिन क्या इसके साथ शिकायत में उठाए गए सभी सवाल भी खत्म हो गए? क्या विभाग ने यह जांच लिया कि परीक्षा फीस किस नियम के तहत ली गई थी?
क्या बच्चों को स्कूल से बाहर करने के आरोप की पड़ताल हुई? क्या स्कूल के फीस रिकॉर्ड की जांच कर यह पता लगाया गया कि दूसरे अभिभावकों से भी इसी तरह राशि ली गई या नहीं?
इन सवालों पर स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए। स्कूल से जवाब मांगने के बजाय समझौते पर जोर क्यों? इस प्रकरण में शिकायतकर्ता परिवार ने प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाई।
बच्चों के साथ हुए व्यवहार पर जवाबदेही तय करना जरूरी... जनसुनवाई में मामला उठने के बाद अधिकारियों के हस्तक्षेप की जानकारी भी सामने आई। इसके बाद राशि लौटाए जाने की प्रक्रिया हुई।
लेकिन शिकायत का असली उद्देश्य केवल पैसे वापस पाना नहीं था, आरोपों की जांच और बच्चों के साथ हुए व्यवहार पर जवाबदेही तय करना भी जरूरी था। यदि स्कूल प्रबंधन ने नियमों के विपरीत फीस वसूली है, तो रकम लौटाने से उस कथित उल्लंघन की जांच अपने आप समाप्त नहीं होनी चाहिए।
यदि बच्चों को स्कूल से बाहर करने का आरोप सही पाया जाता है, तो यह भी देखा जाना चाहिए कि ऐसा किस आधार पर किया गया और क्या संबंधित नियमों का पालन हुआ। शिक्षा विभाग को बताना चाहिए कि मामले में जांच की गई या केवल समझौता कराया गया।
दोनों प्रक्रियाओं में बड़ा अंतर है। समझौता आर्थिक विवाद को खत्म कर सकता है, लेकिन नियमों के उल्लंघन की जिम्मेदारी तय करने का विकल्प नहीं बन सकता।
10 हजार लौटे, अब स्कूल के पूरे रिकॉर्ड की जांच हो... अब जरूरत है कि मामले की जांच केवल शिकायत में बताई गई 1850 रुपए की परीक्षा फीस तक सीमित न रहे। सक्षम अधिकारी स्कूल के फीस रिकॉर्ड, रसीदों, प्रवेश के समय ली गई राशि और संबंधित नियमों के पालन की जांच करें।
यह भी देखा जाए कि स्कूल ने फीस के संबंध में अभिभावकों को क्या जानकारी दी थी और वसूली का आधार क्या था। स्कूल की मान्यता और अन्य अनिवार्य दस्तावेजों का सत्यापन भी लागू नियमों के अनुसार होना चाहिए।
भवन सुरक्षा और अग्नि सुरक्षा से जुड़े रिकॉर्ड की जांच भी संबंधित प्रावधानों के तहत की जा सकती है। यदि किसी स्तर पर अनियमितता मिलती है, तो उसके अनुरूप कार्रवाई की जाए। सवाल यह नहीं कि स्कूल के खिलाफ पहले से दोष साबित मान लिया जाए।
सवाल यह है कि जब शिकायत गंभीर है, तो निष्पक्ष जांच से पीछे क्यों हटा जाए? स्कूल प्रबंधन को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिले, लेकिन जांच के बिना उसे क्लीनचिट भी नहीं मिलनी चाहिए।
सीएम हेल्पलाइन 181 और जनसुनवाई का मकसद क्या सिर्फ शिकायत बंद करना है... सरकार नागरिकों को सीएम हेल्पलाइन 181 और जनसुनवाई जैसे मंचों पर शिकायत करने की सुविधा देती है। इन व्यवस्थाओं की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि शिकायत पर वास्तविक कार्रवाई हुई या नहीं।
इस मामले में भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई गई थी या नहीं। यदि शिकायत दर्ज हुई थी, तो उसका निराकरण किस आधार पर किया गया और क्या मूल आरोपों की जांच की गई?
शिकायतकर्ता को रकम लौटाना एक कदम हो सकता है, लेकिन उससे यह प्रमाणित नहीं होता कि स्कूल की कार्यप्रणाली नियमों के अनुरूप थी। यदि विभाग ने मामले का निराकरण कर दिया है, तो जांच रिपोर्ट, निष्कर्ष और कार्रवाई की स्थिति सामने आनी चाहिए। यदि जांच अधूरी है, तो उसे पूरा किया जाना चाहिए।
अब सरकारी अधिकारियों की भूमिका की जांच हो... इस मामले में सवाल सिर्फ स्कूल संचालक तक सीमित नहीं है। यह भी जांच होना चाहिए कि शिकायत मिलने के बाद संबंधित अधिकारियों ने कौन-कौन से कदम उठाए, किन दस्तावेजों की पड़ताल की और मामले के निपटारे का आधार क्या बनाया।
यदि जांच में सामने आता है कि किसी अधिकारी ने जानबूझकर नियमों की अनदेखी की, जरूरी जांच नहीं की या अनुचित तरीके से स्कूल प्रबंधन को राहत दी, तो उसके खिलाफ भी नियमानुसार विभागीय कार्रवाई होनी चाहिए।
किसी अधिकारी को केवल इसलिए जवाबदेही से बाहर नहीं रखा जा सकता कि शिकायतकर्ता को उसकी राशि वापस मिल गई। जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग को इस मामले में अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए।
जांच का जिम्मा किस अधिकारी को दिया गया, जांच कब और कैसे हुई, क्या निष्कर्ष निकले और आगे क्या कार्रवाई प्रस्तावित है…इन सभी बिंदुओं पर जवाबदेही जरूरी है।
स्कूल संचालक से सीधे सवाल, विभाग भी जवाब दे... सिटी पब्लिक स्कूल के संचालक विजय कुमार शर्मा से पूछा जाना चाहिए कि परीक्षा फीस के रूप में 1850 रुपए लेने का आधार क्या था? यदि राशि नियमों के अनुसार ली गई थी, तो उसका दस्तावेजी आधार सामने रखा जाए।
यदि राशि वापस की गई, तो वापसी की परिस्थितियां भी स्पष्ट की जाएं। बच्चों को स्कूल से बाहर करने के आरोप पर भी स्कूल प्रबंधन को अपना पक्ष रखना चाहिए। वहीं, शिक्षा विभाग को बताना होगा कि क्या उसने फीस वसूली और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने के आरोपों की स्वतंत्र जांच की है।
क्या स्कूल के रिकॉर्ड का सत्यापन हुआ? क्या अन्य अभिभावकों से भी जानकारी ली गई? और यदि नियमों का उल्लंघन मिला, तो कार्रवाई क्या होगी? अब चेक नहीं, जांच और कार्रवाई का हिसाब चाहिए गरीब परिवारों के लिए स्कूल की फीस, किताबें और यूनिफॉर्म जुटाना आसान नहीं होता।
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