भ्रष्टाचार के सच को सियासी रंग देने की कोशिश
KHULASA FIRST
संवाददाता

स्थानीय निकायों में 250 करोड़ के अनुमानित भ्रष्टाचार का डेटा सामने रखने वाले नवाचार के सुशासन आधारित प्रयोग पर मूल सवाल पीछे छूटे
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट इंदौर।
मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में करीब 250 करोड़ के अनुमानित भ्रष्टाचार की खबरें और वीडियो चर्चा में हैं। इसे इस तरह बताया जा रहा है जैसे कोई बहुत बड़ा खुलासा हुआ हो। गंभीर, लेकिन बेबस और अंधभक्त प्रदेश की जनता व भ्रष्ट सिस्टम के लिए औसतन 20% का यह रिश्वतखोर सिस्टम आम बात है।
5 दशक से यह स्थिति लगातार गंभीर रूप लेती जा रही है। राजस्व, उद्योग, आबकारी, वन, विकास प्राधिकरण और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग जैसे तमाम विभाग हैं, जहां भूकंपमापी यंत्र रेक्टर स्केल जैसे भ्रष्टाचार के रेक्टर पैमाने पर रिश्वतखोरी का यह प्रतिशत बड़ा और ज्यादा ताकतवर है।
इसे प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव किसी तरह नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे संबंधित जिम्मेदार लोग हजम नहीं कर पा रहे और इस गंभीर विषय को कमजोर करने की राजनीतिक व मीडियागीरी की कोशिश की जा रही है।
नगरीय विकास एवं आवास विभाग के प्रमुख सचिव संजय दुबे ने प्रदेशभर के मुख्य नगर पालिका अधिकारियों (सीएमओ) को भोपाल बुलाया। उन्होंने डेटा एनालिसिस के जरिये उनके कामकाज में गड़बड़ियों की तस्वीर रखी और साफ कहा कि जो हो रहा है, वह सरकार की नजर से छिपा नहीं है।
इस पहल पर गंभीर चर्चा की जगह इसे विभागीय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के बीच कथित अदावत के रूप में पेश किया जा रहा है। मीडिया के एक हिस्से और कुछ राजनीतिक हलकों में यही कहानी चल रही है। असल सवाल यह है कि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कैसे हो और सिस्टम कैसे सुधरे, पर यह चर्चा से गायब है।
समस्या पुरानी, कोशिश नई... निकायों में कमीशनखोरी कोई नई बात नहीं है। यह कांग्रेस शासन से लेकर आज तक चली आ रही शाश्वत, लेकिब गंदी व्यवस्थागत बीमारी है। 250 करोड़ का आंकड़ा भी इसी प्रचलित 20 से 25 प्रतिशत कमीशन के पैमाने पर आधारित अनुमान बताया जा रहा है। जनता इसे झेलती रही है, पर कार्रवाई की बात कम ही हुई।
प्रयोग की गंभीरता... अब पहली बार अधिकारियों के सामने उनके कामकाज का डेटा आधारित हिसाब रखा गया है। इसे मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप किया गया प्रयोग बताया जा रहा है, जिसका संदेश है कि जो अब तक होता रहा, वह आगे नहीं चलेगा।
मुख्यमंत्री सुशासन की दिशा में लगातार काम करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अ संतुष्ट तत्वों ने तरह-तरह के नैरेटिव बनाकर मुख्यमंत्री को घेरने की कोशिश है की है, ऐसा मुख्यमंत्री के समर्थक बताते हैं।
इसी तरह सुशासन पर काम करने वाले अधिकारियों का कहना है आधुनिक टेक्नोलॉजी और डाटा साइंस के द्वारा गुड गवर्नेंस के मॉडल पर काम किया जा रहा है। मुख्यमंत्री विभाग के प्रमुख सचिव एक ऐसे मॉडल पर काम कर रहे हैं, जिसमें तकनीक के जरिये रिश्वतखोरी पर अंकुश लगाया जा सके।
इसकी गंभीरता को समझे जाने की जरूरत है। विभागीय मंत्रियों को भी सब की मालूमात है। अन्य विभागों में भी इसी तरह की एक्सरसाइज के प्रयास होंगे, ऐसा संबंधित अधिकारियों का कहना है।
भ्रष्टाचार सुधारने की किसी भी कोशिश को राजनीतिक खींचतान में उलझाना मूल मुद्दे से ध्यान हटाता है। अगर मुख्यमंत्री और विभाग व्यवस्था सुधारने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, तो बहस इस पर होनी चाहिए कि कदम कितने कारगर हैं।
इस पर नहीं कि इसके पीछे कौन किससे नाराज है या फिर जांच वगैरह जैसे परंपरागत बयान और कार्रवाई करने जैसी बकवास के बजाय सुशासन को साबित करने की कोशिश हो।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश शासन की शहरी विकास प्रशासन मंत्रालय के अधीन स्थानीय निकाय नगर पंचायत नगर पालिका नगर निगम आदि में 1100 करोड़ से अधिक के कामकाज में से करीब ढाई सौ करोड़ रुपए से अधिक के भ्रष्टाचार का वीडियो और खबरें आ रही हैं।
पूरे प्रदेश में एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट की प्रमुख सचिव संजय दुबे ने प्रदेश के सभी स्थानीय निकाय के विभाग की चीफ म्युनिसिपल ऑफिसर्स को भोपाल में बुलाकर भ्रष्टाचार का यह चित्र डाटा एनालिसिस के साथ बताया और कहा कि जो कुछ कर रहे हैं, आप लोग और सरकार से छिपा नहीं है।
इसे लेकर मीडिया राजनीति से जुड़े लोग मूल विषय को छोड़कर भ्रष्टाचार की इस आम, लेकिन बहुत गंभीर समस्या पर समाधान नियंत्रण की बात नहीं करते हुए मुद्दे से भटकने वाले अजीबोगरीब राजनीतिक तर्क देते हुए विभागीय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और मुख्यमंत्री के बीच अदावत के रूप में पेश कर रहे हैं।
सरकार, विभाग के अधिकारी, प्रमुख सचिव और मंत्री के साथ मुख्यमंत्री को लेकर ढाई सौ करोड़ के अनुमानित भ्रष्टाचार को बहुत बड़ा तो बता रहे हैं, लेकिन प्रदेश में आज से नहीं कांग्रेस की सरकार से लेकर अब तक चले आ रहे इस तरह के आम भ्रष्टाचार, जिसे जनता को स्वीकार करने के लिए राजनीतिक और शासन-प्रशासन, यानी सिस्टम ने मजबूर कर दिया है, पर अंकुश लगाने की बात पिछली सरकारों के लगभग सभी मुख्यमंत्री ने नहीं की।
कांग्रेस की अर्जुन सिंह सरकार हो या फिर भाजपा की पिछली सरकार, सबने भ्रष्टाचार को नहीं चाहते हुए भी रिश्वतखोरी के नवाचार के साथ पोषित किया।
इंदौर जैसे शहर इसके आदर्श मॉडल हैं। इस समय तो खुली छूट है। हालांकि मुख्यमंत्री ने अंकुश लगाया, फिर भी खेल चल रहा है। लूट के इस खेल में हर कोई जानता है और हर कोई चर्चा में बताता है गली-मोहल्ले का भ्रष्ट चरित्र वाला पंच हो या सरपंच या फिर पार्षद 20% से उनकी भ्रष्टाचारी खुराक शुरू होती है।
इंदौर नगर निगम के अंदर रिश्वतखोरी का पैमाना किसी से नहीं छिपा है। पूरे प्रदेश का ढाई सौ करोड़ का भ्रष्टाचार इंदौर नगर निगम या इंदौर विकास प्राधिकरण, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग, राजस्व, पुलिस आदि जैसे विभागों के भ्रष्टाचार के आगे कुछ भी नहीं है।
यह आम आदमी से लेकर मीडिया के लोग भी जानते हैं। इसका खुलासा करने की कोशिश मीडिया में होती रहती है, लेकिन बात बन नहीं रही। अब इस समय स्थानीय निकायों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के गंभीर प्रयास होते नजर आ रहे हैं, तो ऐसे में एक गंभीर विषय को दोयम दर्जे की भाजपाई राजनीति में घसीटने के बजाय पारदर्शी और ईमानदार सिस्टम पर बात जरूरी है।
यह तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रयास हैं कि इस तरह के भ्रष्टाचार के नासूर का इलाज किस तरह किया जाए। इसके लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में छिपे खतरों के बावजूद मजबूत प्रयास नगरीय प्रशासन विभाग के माध्यम से किया गया है।
सिस्टम में किस तरह से वह सब कुछ हो रहा है, जो समाज और सरकार के लिए बेहद खतरनाक है। इसकी शर्मनाक अनुभूति जिम्मेदार अधिकारियों को करने के लिए यह प्रयोग किया गया कि पूरा डाटा एनालिसिस कर उन्हें सच्चाई बताई।
मुख्यमंत्री को कमजोर करने में लगे उन्हीं की पार्टी के नेता शायद इसे हजम नहीं कर पा रहे, क्योंकि हर नेता की अपनी नगर पंचायत से लेकर नगर निगम तक ढाई सौ करोड़ के खेल में समान आनुपातिक भागीदारी है।
भाजपा की गेंदबाजी में जो जिस इलाके में भारी है, वहां उसकी भ्रष्टाचार के रेक्टर स्केल पर रिश्वतखोरी की तीव्रता का पैमाना उतना ही खतरनाक है, जितनी उसकी ताकत। नेताओं के अलावा अफसर भी पूरी तरह से सिस्टम की गंदगी के लिए जिम्मेदार हैं, जो राजनीतिक संरक्षण में भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े खेल कर रहे हैं।
यह कहना भी उचित नहीं है कि यह सब कुछ विभाग के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, मुख्यमंत्री और प्रमुख संबंधित अधिकारियों की जानकारी में नहीं लाकर किया गया विश्लेषण है। भाजपा की पिछली सरकार में भी यही स्थिति थी।
फर्क इतना है कि इस बार मुख्यमंत्री ने व्यवस्था को सुधारने और अंकुश लगाने के लिए जो हो रहा था, जो होता रहा, वह अब नहीं होगा की तर्ज पर जिम्मेदार अधिकारियों को आईना दिखाने के लिए उनके किए का हिसाब-किताब सामने रखवाया।
अब इसमें खबर को दबाने, रुकवाने और सरकार को बदनाम करने जैसे नैरेटिव करने की जगह रिश्वतखोरी को खत्म करने वाली पहल पर बात करना ज्यादा जरूरी है। विजयवर्गीय और मुख्यमंत्री के बीच झगड़े की चटखारे वाली बकवास खबरें बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण सिस्टम को सुधारने की बात होनी चाहिए, जिसकी पहल मुख्यमंत्री और अपर मुख्य सचिव विभाग के प्रमुख सचिव संजय दुबे ने की है।
सरकार को यह भी खुलासा करना चाहिए कि यह सब कितने अधिकारियों ने अपने स्तर पर या फिर कितने अधिकारियों ने राजनेताओं के दबाव-प्रभाव या संरक्षण में किया। ऐसे सब नेताओं के नाम भी सामने आना चाहिए।
एक ऐसा सिस्टम बनाना चाहिए, जहां भ्रष्टाचार का हर फैक्टर और की जा रही गड़बड़ तत्काल सामने आए। हालांकि सार्वजनिक रूप से यह सब कुछ छिपा हुआ नहीं होता। सबको सब कुछ मालूम है, फिर भी सब चल रहा है और इसी को आगे नहीं चलने देने के लिए आईआईटीयन विभाग के प्रमुख सचिव संजय दुबे मुख्यमंत्री के निर्देश पर किसी मॉडल पर काम कर रहे हैं, तो उसकी गंभीरता को समझना चाहिए।
बजाय उसे राजनीति के कीचड़ में घसीटने के। ढाई सौ करोड़ का यह भ्रष्टाचार इस सड़े-गले सिस्टम के 20 से 25% रिश्वतखोरी के स्टैंडर्ड और व्यवहारिक कमीशन आधारित मॉडल पर आधारित है। इसमें कोई नई बात नहीं है। सबको पता है और सब इसके शिकार भी हैं।
आगे के सवाल
डेटा में जो गड़बड़ियां चिह्नित हुईं, उनमें कितनी अधिकारियों के स्तर पर हुईं और कितनी बाहरी दबाव या संरक्षण में, यह सार्वजनिक होना चाहिए।
जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, चाहे अधिकारी हो या कोई और।
इंदौर समेत बड़े निकायों की व्यवस्थाओं की भी जांच होनी चाहिए।
तकनीक आधारित पारदर्शी प्रणाली कब और कैसे लागू होगी, यह स्पष्ट हो।
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