शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर को चांदनी में उतरेगा अमृत: जागती आंखें करेंगी लक्ष्मी का इंतजार
KHULASA FIRST
संवाददाता

शरद पूर्णिमा : जब आसमान से बरसेगी अमृतमयी चांदनी
रविवार की रात खुलेगा आस्था का आसमान, थाली में चांदनी और आंगन में दीप
पूनम की वह रात, जब चंद्र से झरती है मान्यता और घर घर जागते हैं लोग
पूजा की विधियां समय के साथ बदली हैं और आगे भी बदलेंगी
हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शरद ऋतु की साफ रात में जब पूरा चंद्रमा आसमान के बीच आ जाता है, तो आंगन और छतें दूधिया रोशनी में नहा जाती हैं। उसी रोशनी के नीचे एक थाली रखी होती है। उसमें दूध और चावल की खीर है।
घर के लोग आसपास बैठे हैं और कहीं भजन की धीमी आवाज गूंज रही है। शरद पूर्णिमा की रात भारतीय घरों में कुछ ऐसी ही दिखती है। इस बार यह रात रविवार 25 अक्टूबर को आ रही है।
पहले दूर करें तारीख की उलझन
इस साल पूर्णिमा तिथि दो तारीखों में पड़ रही है। इसी कारण कई लोग पूछ रहे हैं कि पर्व 25 को मनाएं या 26 को। पंचांग गणना के अनुसार पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह 11:55 बजे शुरू होगी और 26 अक्टूबर को सुबह 9:41 बजे तक रहेगी।
शरद पूर्णिमा का असली महत्व रात का है। चंद्र दर्शन, रात्रि जागरण और खीर को चांदनी में रखने की परंपरा रात में ही निभाई जाती है। पूरी रात पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर की रात ही मिल रही है। इसलिए पर्व इसी रात मनाया जाएगा।
अमृत बरसने की किंवदंती और चांदनी में रखी खीर
शरद पूर्णिमा का नाम आते ही सबसे पहले चांदनी में रखी खीर याद आती है। लोकमान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है और उसकी किरणों से अमृत बरसता है।
इसी विश्वास के कारण सदियों से लोग खीर को रात भर खुले आकाश के नीचे रखते आए हैं। शाम से ही घरों में तैयारी शुरू हो जाती है। दूध औटाया जाता है। चावल धीमी आंच पर घुलते हैं और पूरे घर में इलायची और केसर की महक फैल जाती है।
रात गहराने पर खीर साफ जाली से ढककर छत या आंगन में रख दी जाती है। अगली सुबह उसे पहले भगवान को अर्पित किया जाता है। फिर परिवार और पड़ोस में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
यह परंपरा आस्था से जुड़ी है। चांदनी में रखने से खीर में अमृत या औषधीय गुण आ जाते हैं, इसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं माना जाता। पर इस परंपरा की असली खूबसूरती दूसरी जगह है।
इसी बहाने पूरा परिवार एक रात एक साथ बैठता है। बुजुर्ग पुरानी कहानियां सुनाते हैं और बच्चे चांद को निहारते हैं। आज की भागदौड़ में ऐसे पल कम ही मिलते हैं।
कैसे करें पूजा और किन बातों का रखें ध्यान
पूजा की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। सामान्य रूप से श्रद्धालु शाम को घर और पूजा स्थल की सफाई कर दीपक जलाते हैं। मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु को पुष्प, फल और मिठाई अर्पित की जाती है।
चंद्रमा के उदय के बाद दर्शन किए जाते हैं और परंपरा के अनुसार जल अर्पित किया जाता है। फिर खीर का भोग लगाया जाता है। अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन या वस्त्र देना भी इस रात पुण्य का काम माना जाता है।
खीर रखते समय कुछ सावधानियां जरूरी हैं। बर्तन को साफ जाली या ढक्कन से ढकना चाहिए। दूध से बनी खीर को बहुत देर तक खुले में सामान्य तापमान पर नहीं छोड़ना चाहिए। व्रत रखने वाले अपनी सेहत का ध्यान रखें। चंद्र दोष या धन प्राप्ति के नाम पर किसी महंगे उपाय को जरूरी न समझें। श्रद्धा के लिए खर्च की नहीं, भाव की जरूरत होती है।
ब्रज की वह रात जब बांसुरी की तान पर थम गया समय
शरद पूर्णिमा की कथा ब्रज की भक्ति परंपरा के बिना अधूरी है। भागवत पुराण के अनुसार शरद ऋतु की ऐसी ही चांदनी रात में वृंदावन में यमुना के तट पर श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाई। उसकी तान सुनकर गोपियां सुध बुध खो बैठीं।
वे घर और काम छोड़कर खिंची चली आईं। उसी रात की स्मृति को महारास कहा जाता है। भक्ति साहित्य में महारास को केवल नृत्य या उत्सव की कथा नहीं माना गया है। इसे जीवात्मा और परमात्मा के मिलन, अनन्य प्रेम और पूर्ण समर्पण का प्रतीक कहा गया है।
इसी कारण इस पर्व को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। आज भी ब्रज के मंदिरों में इस रात का उत्साह देखते ही बनता है। भगवान का विशेष शृंगार किया जाता है। भजन और कीर्तन की गूंज रहती है। रासलीला के आयोजन होते हैं और भोग में खीर अर्पित की जाती है।
एक रात और कई भाव
शरद पूर्णिमा एक ही रात में कई रंग समेटे हुए है। किसी के लिए यह समृद्धि की कामना की रात है। किसी के लिए कृष्ण भक्ति और प्रेम की। किसी के लिए बस परिवार के साथ बैठकर चांद देखने की।
पूजा की विधियां समय के साथ बदलती रही हैं और आगे भी बदलेंगी। पर इस रात के केंद्र में श्रद्धा, परिवार का साथ और दूसरों के प्रति उदारता का भाव आज भी बना हुआ है। इसीलिए इस पर्व को केवल चांदनी में खीर रखने की एक रात मान लेना इसके साथ अन्याय होगा।
यह प्रकृति के सौंदर्य, आध्यात्मिक चिंतन और पारिवारिक एकजुटता का उत्सव भी है। 25 अक्टूबर की रात जब चांद पूरा होगा तो कहीं थाली में चांदनी उतरेगी। कहीं दीपक जलेगा और कहीं भजन गूंजेगा। तरीके अलग होंगे पर भाव एक ही होगा।
कोजागरी: जब पूछा जाता है ‘कौन जाग रहा है’
इस पर्व का एक और प्रचलित नाम है कोजागरी पूर्णिमा। यह नाम संस्कृत के प्रश्न "को जागर्ति" से जोड़ा जाता है। इसका अर्थ है कौन जाग रहा है। मान्यता है कि इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं।
वे हर घर और हर आंगन को देखती हैं। जहां दीपक जलता है और भक्त जागकर पूजा में लीन होते हैं, वहां वे कृपा बरसाती हैं। इसी विश्वास के चलते कई घरों में इस रात कोई नहीं सोता।
दीपक जलाए जाते हैं और लक्ष्मी की आराधना होती है। कई जगह श्रीसूक्त का पाठ भी किया जाता है। एक मान्यता यह भी है कि समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी के प्राकट्य का संबंध इसी तिथि से है।
पर इस रात की प्रार्थना केवल धन तक सीमित नहीं मानी जाती। भारतीय परंपरा में समृद्धि का अर्थ बड़ा है। घर में सुख और शांति रहे, परिवार में सद्भाव रहे, मेहनत का फल मिले और दूसरों की मदद करने की क्षमता बनी रहे। लक्ष्मी पूजन का यही व्यापक भाव इस रात को खास बनाता है।
सोलह कलाओं का क्या है अर्थ
शरद पूर्णिमा के साथ चंद्रमा की सोलह कलाओं की बात अक्सर होती है। भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परंपरा में कला का अर्थ पूर्णता और गुणों की अभिव्यक्ति से जोड़ा गया है। श्रीकृष्ण को भी सोलह कलाओं से पूर्ण माना जाता है।
इसी कारण शरद पूर्णिमा के पूर्ण चंद्रमा को प्रतीकात्मक रूप से उस पूर्णता से जोड़ा जाता है। खगोल विज्ञान की भाषा इससे अलग है। वहां चंद्रमा की कलाओं का अर्थ है सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित उसके दिखाई देने वाले हिस्से में होने वाला बदलाव। दोनों दृष्टियां अपनी जगह हैं। एक का आधार श्रद्धा है और दूसरी का आधार विज्ञान।\
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