आखिर रघुनंदन किसके साथ: दतिया उपचुनाव
KHULASA FIRST
संवाददाता

महेश दीक्षित 98935-66422 खुलासा फर्स्टए, भोपाल।
द तिया उपचुनाव ने भाजपा के भीतर चल रहे उस अंतर्विरोध को सार्वजनिक कर दिया है, जिसे अब तक संगठनात्मक अनुशासन की चादर से ढंकने की कोशिश की जाती रही है। पूर्व गृहमंत्री एवं छह बार के विधायक डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद जिस तरह असंतोष सडक़ों पर दिखाई दिया, वह सिर्फ एक प्रत्याशी के प्रति भावनात्मक लगाव नहीं था, बल्कि संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद की कमी का भी संकेत था।
ऐसे समय में जब भाजपा की पहली प्राथमिकता नाराज कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चुनावी लड़ाई को मजबूत करने की होनी चाहिए थी, तब वरिष्ठ नेता एवं पूर्व राज्यसभा सदस्य रघुनंदन शर्मा ने विरोध करने वाले नेताओं को छह वर्ष के लिए निष्कासित करने की मांग कर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी।
रघुनंदन शर्मा का बयान जितना अनुशासन की बात करता है, उससे कहीं अधिक विरोधाभास पैदा करता है। एक ओर वे सिद्धांतों की पगड़ी पहनकर प्रदेश नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाते हैं, तो दूसरी ओर उसी नेतृत्व से असहमत कार्यकर्ताओं के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की पैरवी करते हैं।
यह दोहरा आग्रह सहज नहीं है। इससे यह समझना कठिन हो जाता है कि उनकी नाराजगी आखिर किससे है। वे डॉ. नरोत्तम मिश्रा के पक्ष में खड़े हैं या उनके विरोध में? वे प्रदेश नेतृत्व को आईना दिखा रहे हैं या उसी नेतृत्व के निर्णयों पर सवाल उठा रहे हैं?
यदि प्रदेश नेतृत्व की कार्यप्रणाली में खामियां हैं, तो असंतोष की जिम्मेदारी भी नेतृत्व पर बनती है। लेकिन यदि सारा दोष केवल कार्यकर्ताओं पर डाल दिया जाए, तो नेतृत्व की जवाबदेही समाप्त हो जाती है। लोकतांत्रिक राजनीति में यह दृष्टिकोण न संगठन को मजबूत करता है और न ही कार्यकर्ताओं का विश्वास लौटाता है।
दतिया में भाजपा की असली चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपने ही कार्यकर्ताओं का विश्वास फिर से अर्जित करना है। चुनाव संवाद से जीते जाते हैं, दंड से नहीं। इतिहास बताता है कि बड़े राजनीतिक दलों ने संकट के समय असहमति को निष्कासन से नहीं, बल्कि संवाद और सम्मान से साधा है। अनुशासन आवश्यक है, लेकिन अनुशासन का अर्थ असहमति का दमन नहीं होता।
रघुनंदन के बयान का एक दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वे सार्वजनिक रूप से प्रदेश नेतृत्व की कार्यशैली पर प्रश्न उठाते रहे हैं। इससे यह सवाल भी स्वाभाविक रूप से खड़ा होता है कि क्या वे स्वयं को भाजपा संगठन का नैतिक संरक्षक मानने लगे हैं? या यह मान बैठे हैं कि, वे ही संगठन का अंतिम विवेक हैं?
या फिर क्या यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि संगठन की दिशा तय करने का अधिकार अब केवल नेतृत्व के पास नहीं, बल्कि उनके पास भी है? वरिष्ठता सम्मान दिला सकती है, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल में संगठन से ऊपर होने का अधिकार नहीं देती।
और यहीं एक बड़ा प्रश्न भाजपा संगठन से भी जुड़ जाता है। यदि रघुनंदन बार-बार सार्वजनिक मंचों से प्रदेश नेतृत्व की आलोचना करते हैं, उसकी कार्यशैली पर सवाल उठाते हैं और तीखी टिप्पणियां करते हैं, तो आखिर संगठन की प्रतिक्रिया क्या है?
यदि ऐसे बयानों से संगठन असहमत है, तो उसकी स्पष्ट असहमति क्यों दिखाई नहीं देती? और यदि सहमत है, तो फिर यह मान लिया जाए कि रघुनंदन की आलोचना संगठन की ही आवाज है। दोनों ही स्थितियों में मौन अपने आप में एक राजनीतिक संदेश बन जाता है।
राजनीति में शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं होते, वे संकेत भी होते हैं। वरिष्ठ नेताओं के बयान कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाते भी हैं और बिगाड़ते भी हैं। इसलिए ऐसे समय में अपेक्षा समाधान की होती है, नई दरारें पैदा करने की नहीं। दतिया उपचुनाव अब केवल एक सीट का चुनाव नहीं है।
यह भाजपा के नेतृत्व, अनुशासन, संवाद और आंतरिक लोकतंत्र की भी परीक्षा है। और जब तक इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर नहीं मिलते, तब तक यह सवाल राजनीतिक गलियारों में गूंजता रहेगा, आखिर रघुनंदन किसके साथ हैं?
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