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मैं क्या कहता हूं, अहिल्या नगरी अब पुष्यमित्र की : पुष्यमित्रजी अब आपकी बारी है

04-08-2022 : 03:13 pm ||

पुष्यमित्र भार्गव अब से 5 सालों के लिए लोकमाता अहिल्याबाई की नगरी इंदौर के प्रथम नागरिक (महापौर) होंगे। शहर का समुचित और व्यवस्थित विकास, बिजली, पानी, सड़क ट्रैफिक व पार्किंग सेवा सुविधा प्रदान करना उनकी जिम्मेदारी है। इसके अलावा भविष्य की जरूरतों के हिसाब से तैयारी के साथ ही शहर की सभ्यता संस्कृति और संस्कारों को बचाए रखने की चुनौती भी नवनिर्वाचित महापौर के सामने खड़ी है।


गोविंद शर्मा "गोविंद' पत्रकार, कवि व यथार्थवादी चिंतक

यहां के न्यायप्रिय मूल स्वभाव को जीवित रखने की भी जरूरत है। भ्रष्टाचार रूपी कीचड़ में अपनी आभा से माहौल को सरोवर सा बदलने की आवश्यकता है। ज्ञात रहे कि मां अहिल्या की नगरी इंदौर सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों के लिए जानी जाती थी। उत्सव प्रेमी, धर्मनिष्ठ, ईमानदार, सेवाभावी नागरिकों ने हमेशा इस नगरी का मान बढ़ाया। शासक के तौर पर मां अहिल्या की न्यायप्रियता के लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है और वैसा ही स्वभाव शहर का भी बना हुआ है। लेकिन बीते कुछ सालों में यह सब कुछ खत्म सा हो चला है। भौतिकी युग की चकाचौंध कहे या बाजारवाद का चलन मानो सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों को लीलता जा रहा है। पब कल्चर तेजी से परोसा जा रहा, जिसके भविष्य में वैश्यालय में तब्दील होने का डर है। जिम्मेदार शहर के स्वभाव और नागरिकों का नैतिक पतन होता देख तमाशाई बने हुए हैं। कुछ तो अपने अतिवादी रुख के चलते नागरिकों के साथ बदतमीजी नाइंसाफी कर बढ़-चढ़कर इसमें भागीदारी भी निभा रहे। बगैर कीमत (मुआवजा) चुकाए नागरिकों की वैध संपत्ति घर-दुकान स्मार्ट सिटी मास्टर प्लान सड़क चौड़ीकरण के नाम पर बदलाव उन्हें अपमानित कर छीनी तोड़ी जा रही है। यह किसी भी नजरिया से न्यायप्रिय व्यवस्था नहीं की जा सकती। यह दमनकारी नीति, अन्यायपूर्ण व्यवस्था है।


नगर सरकार को यह अन्याय करने से बचने की जरूरत है। न्याय की देवी माता अहिल्या की नगरी की ख्याति उसी अनुरूप बनी रहे यह भी आवश्यक है। विकास के नाम पर बेतरतीब इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर शहर की महान धार्मिक व सांस्कृतिक पहचान को नष्ट किया जा रहा। महज इंफ्रास्ट्रक्चर को ही विकास मान लिया गया है, जबकि किसी भी शहर के मूल स्वभाव को जीवित रखना भी वहां के शासक की जिम्मेदारी होती है। अब तक के सभी महापौर ने कहीं ना कहीं इस तथ्य को अपनी प्राथमिकता से परे रखकर नजरअंदाज किया है। पुष्यमित्रजी अब आपकी बारी है। आप इस शहर की महान धार्मिक, सांस्कृतिक, पहचान और न्यायप्रिय मर्यादित सेवाभावी स्वभाव को जीवित रख पाने के कितने ओर कैसे प्रयास करते हैं यह आगामी समय में सामने आएगा ही। उम्मीद है कि आप इस तरह से भी चिंतन कर काम करेंगे।


करोड़ों रुपए की बंदरबांट में भटक न जाना मित्र

करीब 3000 करोड़ का बजट, राज्य सरकार से 2000 करोड़, केंद्र सरकार से 5000 करोड़, मेट्रो रेल के 8000 हजार करोड़, यानी कि लगभग 18 से 20 हजार करोड़ रुपए से आने वाले 5 वर्षों में शहर में इंफ्रास्ट्रक्चर के मान से विकास की एक नई इबारत लिखी जाएगी। यह एक चमत्कारी कार्य होगा, जिसके पूरा होने पर इंदौर मेट्रो सिटी के रूप में लगभग पूरे देश में सर्वाधिक उन्नत आधुनिक शहर के रूप में खड़ा होगा। सब कुछ ऐसा हो इसके लिए यह जरूरी है कि पैसे सही जगह पर खर्च हो और भ्रष्टाचार की भेंट ना चढ़े। अफसर और नेता हमेशा की तरह अपने स्वभाव अनुरूप इस पैसे का दुरुपयोग व भ्रष्टाचार करने से बचें। तब ही शायद यह जो परिकल्पना की जा रही है, वह वास्तविक स्वरूप में दिखाई दे, इसके लिए जिम्मेदार लोगों का ईमानदार रहना अति आवश्यक है। खासकर नगर सरकार के मुखिया पुष्यमित्र का सही राह पर चलना और राह से भटकने से बचना आवश्यक है।



मूलभूत सेवा सुविधा की उपलब्धता बड़ी चुनौती

शहर के आधुनिक होने के साथ ही मूलभूत सुविधाएं खासकर बिजली-पानी, चिकित्सा सेवा सुविधा की उपलब्धता भी एक चुनौती है। इस दिशा में गंभीर व ईमानदार प्रयास काफी पहले किए जाने थे, जो अब अति आवश्यक हो गए हैं।  गौरतलब है कि बिजली की लुकाछुपी किसी से छुपी नहीं है और पानी की उपलब्धता किस तरह की है यह सर्वविदित है। महीने में 15 दिन हम शहर को पानी दे पा रहे हैं और किस तरह का यह भी स्पष्ट है। गर्मियों के दिनों में जल संकट को लेकर जो स्थितियां हर वर्ष बनती है, वह भी किसी से छिपी नहीं है। चिकित्सा सेवा सुविधा के मामले में कोरोना काल में सारी स्थितियां सामने आ चुकी हैं। आवश्यक सेवा सुविधाओं की उपलब्धता को लेकर समस्याएं सामने आएंगी ही, जिससे निपटने के लिए अभी से ठोस और आवश्यक प्रबंध किए जाना आवश्यक है, जो मूर्त रूप में अब तक कहीं दिखाईं नही देते। इधर, मेट्रो सिटी होने पर जहां एक और शहर आधुनिक होगा वहीं महंगा भी। नीचे की दो व्यवस्था गरीब और निम्न मध्यम वर्ग की पहुंच से यह शहर दूर होता चला जाएगा। बड़ी संख्या में शहर से पलायन होगा, जिसे रोकने के लिए भी चिंतन होना चाहिए। 


शहर का वह नागरिक जो यहां का मूल स्वभाव है यदि कटता है, तो यह शहर के मिजाज  के हिसाब से भविष्य में शायद ठीक ना रहे। बाहरी लोगों की संख्या अत्यधिक होने पर जैसा कि दिखाई दे रहा शहर का स्वभाव कहीं इसके दुष्परिणाम ना आने लगे। शहर का आधुनिक (मेट्रो सिटी) होना आवश्यक हो सकता है, लेकिन मानवता जीवित रहे इसके लिए इसके वास्तविक महान धार्मिक सांस्कृतिक, उत्सव प्रेमी, मर्यादित, सेवाभावी राष्ट्रीय स्वभाव को जीवित रखना बड़ी जरूरत है। ज्ञात रहे कि महज इंफ्रास्ट्रक्चर को ही विकास नहीं कहा जा सकता। वास्तविक विकास तब है कि जब नागरिकों को उनके निश्चित परिश्रमी समय खर्च करने पर जरूरतों की पूर्ति सहजता-सरलता से हो और मूलभूत सेवा सुविधाएं आसानी से सुलभ हो। नागरिकों के जान माल सुरक्षा की गारंटी हो, जीवनशैली व्यवस्थित रहे जो उनके आचरण में नजर आए। खुशहाल मुस्कुराते नागरिक ही विकास को सही परिभाषित करते, विकास की गवाही देते दिखाई दें। शायद यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए और वास्तविक विकास की परिभाषा भी। 


उम्मीद : भ्रष्टाचार रूपी कीचड़ स्वच्छ सरोवर में बदले

शहर के नवनिर्वाचित महापौर पुष्यमित्र भार्गव चार व्यवस्था में से एक न्यायपालिका के हामी भी रहे ओर अब दूसरी व्यवस्था में है। भार्गव से न्याय की उम्मीद भी नागरिकों को कुछ अधिक ही होगी, जिसे पूरा करना उस पर खरा साबित होना उनके लिए निश्चित ही एक चुनौती भरा काम है। विदित रहे निगम कर्मचारी व अधिकारियों द्वारा दुर्व्यवहार किए जाने और बगैर मुआवजा दिए तोड़फोड़ जैसी दमनकारी नीति और अन्यायपूर्ण व्यवस्था अमल में लाने को लेकर नगर सरकार पर अन्याय करने के आरोप लगते रहे हैं ओर फिर नगर पालिका निगम शहर में भ्रष्टाचार का एक बड़ा अड्डा है।


निगम के दर्जनों अफसर व कर्मचारी की करतूतों के सामने आने से यह स्पष्ट भी हो चुका है। भ्रष्टाचार की बाढ़ में बहता रिश्वत का कीचड़ इस परिसर में चारों और पसरा हुआ है, जिसमें पुष्यमित्र नाम का कमल खिला है। पुष्यमित्र न्याय क्षेत्र से आते हैं। शहर की जनता ने शायद गुणवान, सामर्थ्यवान, चरित्रवान व ईमानदार जानकर भरोसा किया है। पुष्यमित्र को अपनी आभा को बचाए रखने के लिए इस कीचड़ को दलदल में बदलने से रोकना होगा। साथ ही ऐसे प्रयास भी करने होंगे, जिससे भ्रष्टाचार रूपी कीचड़ स्वच्छ सरोवर में बदल जाए। बहरहाल पुष्यमित्र कौन सी चुनौती को किस तरह से लेते हैं। वह किस तरह इसका सामना करेंगे और कितना ईमानदार उनका प्रयास होगा यह आने वाले कुछ माह में स्पष्ट होता नजर आएगा। हमें आशा है कि पुष्यमित्र ईमानदारी से निष्ठा पूर्वक शहर के प्रति विशेष लगाव रखते हुए कुछ खास कर गुजरने का मादा लेकर पूरी ऊर्जा के साथ कदम दर कदम हालातों को सुधारते विकास के पथ पर आगे बढ़ेंगे। उम्मीद है कि हमारे शहर का शुमार आधुनिकता के साथ अध्यात्मिक महान धार्मिक सांस्कृतिक, उत्सव प्रेमी, न्यायप्रिय नगरी के रूप में देश और दुनिया में होगा। इन्ही मंगलकामनाओं के साथ पुष्यमित्र को अनंत शुभकामनाएं।


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