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‘खड़ाऊ’ वाले...खड़गे : कांग्रेस पर गांधी परिवार का दबदबा फिर साबित

20-10-2022 : 02:41 pm ||

नितिन मोहन शर्मा… खुलासा फर्स्ट… इंदौर ।

हमारे भारत में तो राजा भरत ने राजा रामचंद्रजी की पादुकाओं के जरिए एक दो नहीं, पूरे 14 बरस राज्य संचालन किया। सिंहासन पर अपनी जगह बड़े भाई रामचंद्रजी के पदवेश उन्होंने रखे और उसी पदवेश को हाज़िर-नाजिर मान अयोध्या पर शासन किया। शासन भी उसी रामराज्य की भावनाओं के अनुकूल, जो मर्यादा पुरुषोत्तम के मनोनुकूल थी। ये भारत के संस्कार में ही है। ये घुट्टी भारत के डीएनए में ही है कि जिन्हें आप प्राणों से प्रिय मानते हैं, सम्मान देते हैं, उन पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं।


कांग्रेस मुक्त करने निकली भाजपा के लिए ये दबदबा एक सबक

वोट के जरिए अध्यक्ष चुन कांग्रेस ने बढ़ाया भाजपा पर नैतिक दबाव

रामजी की पादुकाओं के संग भरत के राज्य संचालन का ये प्रसंग फिर से इस भरत भूमि पर याद आया है।  कारण बना है कांग्रेस का अध्यक्ष पद चुनाव। हालांकि यहां न कोई राम है न भरत। ये प्रतीक तो महज इसलिए याद आए कि वयोवृद्ध मल्लिकार्जुन खड़गे चुनाव तो जीते लेकिन उनकी इस जीत को गांधी परिवार की जीत मुकर्रर किया गया है।  खड़गे की ताजपोशी पर कांग्रेस में तो हर्ष है लेकिन विरोधी उन्हें ‘ मनमोहन पार्ट-2’ का तमगा दे रहे हैं। यानी गांधी परिवार के ‘ यस मेन’।  यानी अध्यक्ष की कुर्सी पर खड़गे बैठे दिखेंगे जरूर, लेकिन करेंगे वही जो सोनिया गांधी, राहुल और प्रियंका के मनोनुकूल होगा। यानी...वही, खड़ाऊ वाले खड़गे..!!


मल्लिकार्जुन ये खड़ाऊ ( चरण पादुका-पदवेश ), कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर तो वैसे रख नहीं पाएंगे, जैसी त्रेता युग में रखी गई थी। लेकिन कांग्रेस का संचालन उसी खड़ाऊ के जरिए ही होना तय है, जो मल्लिकार्जुन के लिए “ 10 जनपथ” पर बहुत सोच समझकर तैयार हुई है। अब विरोधी, खासकर भाजपा भले ही खड़गे के चयन की खिल्ली उड़ाए लेकिन शायद उसको स्मरण नहीं, उमा भारती प्रसंग में उसके दल में भी कुछ कुछ ऐसा ही घटित हुआ था। 


भाजपा याद करे उमा प्रसंग 

याद आया? उमा भारती से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनी थी। तब उनकी जगह किसे सत्तासीन करे, ये संकट भाजपा के पास भी था। दावेदारो की भीड़ थी लेकिन उमाजी के वारिस बने स्व. बाबूलाल गौर जैसे खांटी नेता। तब स्व. गौर ने कहा था मैं उमाजी की खड़ाऊ कुर्सी पर रखकर सरकार चलाऊंगा। वे जब लौटकर आएंगी, उन्हें ‘ज्यो की त्यों धर दीनी चदरिया’ की तर्ज पर सत्ता सौंप दूंगा। फिर क्या हुआ...ये सबको पता है और आज भी उमाजी ‘ निर्वासित’ हैं। अब यही भाजपा खड़गे की खड़खड़ाहट पर हंस रही है। हंसने वाली भाजपा के लिए कांग्रेस का ये चुनाव भी कई सबक लेकर आया है। सबसे बड़ा सबक तो यही कि आप कितने भी सोनिया, राहुल-प्रियंका को ‘घेरे’ में लें, पार्टी में इस परिवार के प्रति निष्ठा आज भी अटूट ही नहीं अटाटूट है। दूसरा सबक ये कि कांग्रेस ने वोट के जरिए अपने दल के अध्यक्ष का चुनाव कर ये तो बता दिया उसके पास चुनाव के जरिए अध्यक्ष चुनने की कूबत है। क्या भाजपा के पास है? भाजपा भले ही इस पूरी प्रक्रिया को नूराकुश्ती करार दे लेकिन कांग्रेस ने रिस्क तो ली।


सोचिए अगर थरूर भले ही चुनाव हार जाते लेकिन उन्हें ज्यादा मत मिलते तो? ये साफ संदेश देश-दुनिया में जाता कि भारत की सबसे पुरानी पार्टी में गांधी फेमिली के प्रति निष्ठा में कमी आना शुरू हो गई है। उलटे कांग्रेस ने थरूर के जरिए अपने दल में आंतरिक लोकतंत्र का उदाहरण भाजपा सहित अन्य पार्टियों के समक्ष तो पेश किया साथ ही भाजपा सहित सब दल को ये संदेश भी दे दिया कि कांग्रेस में गांधी परिवार के प्रति निष्ठा में रत्तीभर कमी नहीं आई, फिर भले ही चाहे कितने ‘ नेशनल हेराल्ड’ हो जाएं। 


इस चुनाव ने गांधी परिवार से मुक्त हो कांग्रेस..जैसे कथित अभियान की भी हवा निकाल दी। थरूर को मिले वोट इस बात का साफ संकेत देते हैं कि ये 99 और 1 प्रतिशत का मुकाबला था। यानी पूरी पार्टी गांधी परिवार के साथ एकजुट है। चाहे ईडी की रेड पड़े या लगातार पार्टी चुनाव हारे। “हारे का सहारा-गांधी परिवार हमारा” की तर्ज पर पूरी कांग्रेस वैसे ही 10, जनपथ के समक्ष नतमस्तक है, जैसे हारे का सहारा-खाटू श्याम हमारा का जयघोष कर कृष्णानुरागी खाटू नरेश के समक्ष दंडवत होते हैं।


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