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सेल्फ कॉन्फिडेंस और एरोगेंस : अवंतिका का ‘संवाद’ और सचिन का ‘गजनी’ बनना, कोहली के लिए दोनों क्यों जरूरी है

20-07-2022 : 03:33 pm ||

मनोज खांडेकर वरिष्ठ पत्रकार

विराट कोहली को लेकर नवीन श्याम यादव ने काफी इमोशनल होकर लिखा था तो चंद्रशेखर शर्मा कई दिनों से खरी-खरी लिख रहे थे। दोनों पिछले काफी दिनों से विराट पर लिख रहे हैं। मैं सोच रहा था कि कुछ लिखना चाहिए, लेकिन हर बार की तरह आलस। फिर अनिमेष पाठक ने कहा कि अच्छा लिखते थे, लिखते रहा करो। तो सोचा चलो विराट पर ही लिखा जाए।


अहमदाबाद से वापस लौटते वक्त फ्लाइट लेट होने की वजह से हॉट स्टार पर एक नई सीरीज शूरवीर का पहला ही एपिसोड देख रहा था। उसमें फाइटर पायलट अवंतिका के किरदार में तमिल की मशहूर स्टार रेजिना कैसेंड्रा हैं। अवंतिका का एक संवाद है, जिसमें वह कहती है, ‘कॉन्फिडेंस होना अच्छी बात है, लेकिन, सेल्फ कॉन्फिडेंस और एरोगेंस में धागे भर का फर्क होता है।’ 


विराट कोहली के तीसरे वनडे में फिर उसी तरीके से आउट होने पर मुझे 24 घंटे पहले अवंतिका का यह संवाद याद आ गया, इसलिए क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि विराट जब बल्लेबाजी करने मैदान में होते हैं, तो उनकी बल्लेबाजी में सेल्फ कॉन्फिडेंस की जगह एरोगेंस हावी हो जाता है। एक दौर था या यूं कहें कुछ बरस पहले की बात होगी जब विराट मैदान में आकर पहली गेंद से ही विरोधी गेंदबाजों पर चढ़ाई कर देते थे। उनके खेल की यह आक्रमकता उन्हें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज बनाती है। उनका खेलने का यह नेचरल तरीका है। 


आप कोहली की पिछली कई पारियां उठाकर देख लीजिए, वह शुरुआत अच्छी कर रहे हैं और ऑफ साइड में कुछ बेहतरीन शॉट भी देखने को मिलते हैं। बस यहां आकर ही उनका खेल हो जाता है। लगता है कि कोहली वक्त के अनुरूप खुद को बदलना नहीं चाहते हैं। धागे भर का फर्क है, लेकिन सेल्फ कॉन्फिडेंस जब एरोगेंस में बदस्तूर बदलता जा रहा है। कुछ शॉट्स के बाद शायद कोहली को इस बात का अहसास होने लगता है कि उन्हें अब ऑफ साइड के बाहर की गेंदों पर कोई आउट नहीं कर सकेगा और ये ‘एरोगेंस’ ही उनका विकेट ले रहा है। गेंदबाज उनको ऑफ साइड के बाहर गेंदों पर ट्रेप कर अपना शिकार बना रहे हैं।


सेल्फ कॉन्फिडेंस और एरोगेंस में अंतर समझना हो तो विराट को सचिन तेंदुलकर से सबक लेने की जरूरत है। विराट जिस तरीके से आउट हुए हैं, उन्हें अपने आदर्श सचिन तेंदुलकर के नक्शे कदमों पर चलने की दरकार है। बस एक अच्छी अनुशासित पारी और कोहली फिर टॉप ऑफ द वर्ल्ड होंगे। 


क्योंकि सचिन की सफलता का राज भी ‘ सेल्फ कॉन्फिडेंस ‘ और ‘एरोगेंस’ के अंतर्द्वंद्व में छिपा हुआ है। इसलिए विराट पर बात करते हुए अचानक 18 साल फ्लैश बैक में चला गया।


बात दो जनवरी 2004 की है। पूरी दुनिया नए साल के जश्न में डूबी हुई थी। भारतीय टीम उस वक्त ऑस्ट्रेलिया दौरे पर थी। नए साल की खुशियों के बीच सचिन अपने ही ख्यालों में खोए हुए थे। लक्ष्मण और द्रविड़ के करिश्माई बल्लेबाजी की बदौलत तीन टेस्ट मैचों के बाद सीरीज 1-1 से बराबरी पर थी। 


उम्मीद तो थी कि मास्टर ब्लास्टर का बल्ला गरजेगा, लेकिन दो जनवरी 2004 को जब चौथा और अंतिम टेस्ट शुरू हुआ, उस वक्त सचिन ने पांच पारियों में सिर्फ 82 रन बनाए थे। मेलबर्न में खेले गए तीसरे टेस्ट में सचिन लय में नजर आ रहे थे, लेकिन अपने पसंदीदा शॉट कवर ड्राइव खेलने की कोशिश में सचिन अपना विकेट गंवा बैठे थे। जैसा कि अभी विराट आउट हो रहे हैं। सिडनी टेस्ट ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर सचिन को अपना क्लास साबित करने के लिए आखिरी मौका था। चौथे टेस्ट के पहले दिन लंच के 10 मिनट बाद भारतीय पारी का दूसरा विकेट गिरा तब सचिन ने मैदान में पहला कदम रखा था। 


चिर-परिचित अंदाज में सूर्य की तरफ देखते हुए सचिन सधे हुए कदमों से 22 यार्ड की तरफ बढ़ रहे थे। दर्शकों का शोर पूरे शबाब पर था। ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज को भी मानो इसी पल का इंतजार था। शेर का शिकार कर जंगल पर राज करने का ख्वाब कंगारू गेंदबाजों की आंखों में नजर आ रहा था, लेकिन सचिन के खेल पर बारीक नजर रखने वाले जानते थे कि सचिन जिस अंदाज में विकेट पर पहुंचे थे आज वह कुछ अलग ही करने का इरादा लेकर आए थे।


पिछली पांच पारियों में 82 रन के डरावने ख्वाब को वो पीछे छोड़ देना चाहते थे। पहले दिन दूसरे सेशन में बल्लेबाजी करने आए सचिन तीसरे दिन सुबह तक क्रीज पर डटे हुए थे। जब भारत ने सात विकेट पर 705 रन बनाकर पारी घोषित की। क्रिकेट के बादशाह ने दुनिया को बता दिया था कि यूं ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों में शुमार नहीं किया जाता।


दरअसल, ऑस्ट्रेलिया दौरे पर पहले तीन टेस्ट में एक ही तरह का शॉट खेलकर सचिन अपना विकेट गंवा रहे थे। लगातार ऑफ साइड से बाहर जाती गेंदों पर आउट हो रहे थे। खासतौर पर कवर ड्राइव की वजह से क्रिकेट का यह भगवान नाकाम हो रहा था। सचिन ने सिडनी में खेले गए चौथे टेस्ट के पहले तय कर लिया था कि वो ऑफ स्टम्प से बाहर जाती गेंदों को खेलने के मोह में नहीं पड़ेगे। ऑस्ट्रेलिया टीम के इस मायाजाल से बचने के लिए सचिन ने अपने सबसे पसंदीदा शॉट कवर ड्राइव को भी त्याग दिया। वो 10 घंटे 13 मिनट तक क्रीज पर डटे रहे। इस दौरान उन्होंने 436 गेंदों का सामना किया लेकिन अपनी मैराथन पारी में वो अड़िग रहे और उन्होंने एक बार भी कवर ड्राइव लगाने की कोशिश तक नहीं की। 


दुनिया जानती है कि सचिन फ्रंटफुट और बैकफुट दोनों से कवर पर करारे शॉटस जमाते हैं, लेकिन सचिन 613 मिनट तक किसी अलग ही दुनिया में थे। एक संत की तरह सचिन, सिडनी के मैदान पर समाधि लगाए हुए थे। सचिन अनुशासन की मिसाल बन गए थे। ऑफ साइड से बाहर जाने वाली गेंद को वह सैकड़ों बार छोड़ते रहें। इस पारी को देखने के लिए टेनिस की महानतम खिलाड़ियों में शुमार मार्टिना नवरातोलिवा भी सिडनी ग्राउण्ड पर मौजूद थीं। यूं तो मार्टिना को क्रिकेट से कोई खास लगाव नहीं था, लेकिन सचिन की पारी देख वो उनकी तारीफ किए बगैर रह नहीं सकीं। टेनिस की आयरन लेडी ने कहा, सचिन पूरी तरह से फोकस्ड नजर आ रहे थे। वो हर किसी के लिए सबक है। उम्मीद है कोहली भी यह ‘मोह’ छोड़ेंगे और दुनिया में फिर अपना परचम लहराएंगे।


शुरुआत अवंतिका से की थी और अंत गजनी फिल्म के हैविवेट सुपररिच मालिक संजय सिंघानिया के उस संवाद के साथ, जिसमें वह कहते हैं, “ विश्वास और घमंड में बहुत कम फर्क है! मैं कर सकता हूं यह मेरा विश्वास है, सिर्फ मैं ही कर सकता हूं यह मेरा घमंड है। शायद कोहली को भी ‘गजनी’ बनने की जरूरत है। शॉर्ट टर्म मैमोरी लॉस की तरह उन्हें भूलना होगा कि वह ऑफ साइड में गेंदबाज को जब चाहे और जैसा चाहे शॉट जमा सकते है। वह दौर फिर आएगा, लेकिन इस लंबी उड़ान के टेक ऑफ के लिए उन्हें रनवे पर पर अपनी लय पकड़नी होगी।

सोशल मीडिया से साभार


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