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नागेश्वर धाम ज्योतिर्लिंग : सुप्रिय की शिव-भक्ति

05-08-2022 : 02:58 pm ||

एतद् यः शृणुयात्नित्यं नागेशोद्भवमादरात्।

सर्वान् कामानियाद् धीमान् महापातकनाशनम्

नागेश्वर मन्दिर एक प्रसिद्द मन्दिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। यह द्वारका, गुजरात के बाहरी क्षेत्र में स्थित है। यह शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।हिन्दू धर्म के अनुसार नागेश्वर अर्थात नागों का ईश्वर होता है। यह विष आदि से बचाव का सांकेतिक भी है। रुद्र संहिता में इन भगवान को दारुकावने नागेशं कहा गया है। भगवान् शिव का यह प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग गुजरात प्रांत में द्वारका पुरी से लगभग 17 मील की दूरी पर स्थित है।


पं. प्रकाश जोशी 9009430739

सुप्रिय नामक एक बड़ा धर्मात्मा और सदाचारी वैश्य था। वह शिवजी का अनन्य भक्त था। वह निरन्तर उनकी आराधन, पूजन और ध्यान में तल्लीन रहता था अपने सारे कार्य वह भगवान शिव को अर्पित करके करता था। मन, वचन, कर्म से वह पूर्णतः शिवार्चन में ही तल्लीन रहता था। उसकी इस शिव भक्ति से दारुक नामक एक राक्षस बहुत क्रुद्ध रहता था। उसे भगवान् शिव की यह पूजा किसी प्रकार भी अच्छी नहीं लगती थी। वह निरन्तर इस बात का प्रयत्न किया करता था कि उस सुप्रिय की पूजा-अर्चना में विघ्न पहुँचे।


एक बार सुप्रिय नौका पर सवार होकर कहीं जा रहा था। उस दुष्ट राक्षस दारुक ने यह उपयुक्त अवसर देखकर उस नौका पर आक्रमण कर दिया। उसने नौका में सवार सभी यात्रियों को पकड़कर अपनी राजधानी में ले जाकर कैद कर दिया। सुप्रिय कारागार में भी अपने नित्य नियम के अनुसार भगवान शिव की पूजा-आराधना करने लगा। अन्य बन्दी यात्रियों को भी वह शंकर जी की भक्ति की प्रेरणा देने लगा। दारुक ने जब अपने सेवकों से सुप्रिय के विषय में यह समाचार सुना तब वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस कारागार में आ पहुँचा।


सुप्रिय उस समय भगवान शिव के चरणों में ध्यान लगाये हुए दोनों आँखें बन्द किये बैठा था। उस राक्षस ने उसकी यह मुद्रा देखकर अत्यन्त भीषण स्वर में उसे डाँटते हुए कहा, ‘अरे दुष्ट वैश्य! न तू आँखें बन्दकर इस समय यहाँ कौन-से उपद्रव और षड्यन्त्र करने की बातें सोच रहा है?’ उसके यह कहने पर भी धर्मात्मा शिवभक्त सुप्रिय वैश्य की समाधि भङ्ग नहीं हुई। अब तो वह दारुण नामक महाभयानक राक्षस क्रोध से एकदम बावला हो उठा। उसने तत्काल अपने अनुचर राक्षसों को सुप्रिय वैश्य तथा अन्य सभी बन्दियों को मार डालने का आदेश दे दिया।


दारुक का वध

सुप्रिय उसके इस आदेश से जरा भी विचलित और भयभीत नहीं हुआ। वह एकनिष्ठ भाव और एकाग्र मन से अपनी और अन्य बन्दियों की मुक्ति के लिये भगवान् शिव को पुकारने लगा। उसे यह पूर्ण विश्वास था कि मेरे आराध्य भगवान शिव जी इस विपत्ति से मुझे अवश्य ही छुटकारा दिलायेंगे। उसकी प्रार्थना सुनकर क भगवान शंकर जी तत्क्षण उस कारागार में एक ऊँचे स्थान में एक चमकते हुए सिंहासन पर स्थित होकर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गये। उन्होंने इस प्रकार सुप्रिय को दर्शन देकर उसे अपना पाशुपत अस्त्र भी प्रदान किया। उस अस्त्र से राक्षस दारुक तथा उस के सहायकों का वध करके सुप्रिय शिव धाम को चला गया। भगवान शिव के आदेशानुसार ही इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर पड़ा।


80 फीट ऊंची शिवजी की मूर्ति नागेश्वर धाम में बनी है

नागेश्वर धाम की महिमा

इस पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन की शास्त्रों में बड़ी महिमा बतायी गयी है। कहा गया है कि जो श्रद्धा पूर्वक इसकी उत्पत्ति और माहात्म्य की कथा सुनेगा, वह सारे पापों से छुटकारा पाकर समस्त सुखों का भोग करता हुआ अन्त में भगवान् शिव के परम पवित्र दिव्य धाम को प्राप्त होगा।


मंदिर के पास है करीब 80 फीट ऊंची मूर्ति

मंदिर परिसर में भगवान शिव की पद्मासन मुद्रा में एक विशालकाय मूर्ति है। जो करीब 80 फीट ऊंची है। जो यहां का मुख्य आकर्षण है। इस मूर्ति के आसपास पक्षियों का झुण्ड मंडराता रहता है। भक्त यहां पक्षियों के लिए अन्न के दाने भी डालते हैं। माना जाता है कि सावन  महीने में इस प्राचीन नागेश्वर शिवमंदिर में स्थापित शिवलिंगों की एक साथ पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। मंदिर में इन अद्भुत शिवलिंगों के दर्शन और पूजन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। सावन में विशेष रूप से सोमवार को खासी भीड़ रहती है।


शिवपुराण: नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन से ही खत्म हो जाते हैं पाप  

गर्भगृह सभामंडप से निचले स्तर पर है। ज्योतिर्लिंग सामान्य बड़े आकार का है जिस पर एक चांदी का आवरण चढ़ा रहता है। ज्योतिर्लिंग पर ही एक चांदी के नाग की आकृति बनी हुई है। गर्भगृह में पुरुष भक्त धोती पहनकर ही प्रवेश कर सकते हैं, वह भी तभी जब उन्हें अभिषेक करवाना है। शिवपुराण के अनुसार नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के बाद उसकी उत्पत्ति और माहात्म्य सम्बन्धी कथा को सुनने से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं।


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