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Hindi News / indore / Blessed be a shield Blow up the spirit of God in the society wake up

बिना खड्ग-ढाल...भरो हुंकार : समाज में भगवती भाव...जागृत हो

26-09-2022 : 03:34 pm ||

नवरात्रि विशेष

नारी के लिए हो देवी भाव की दृष्टि लोकचेतना जागे

हर कन्या- हर युवती -हर स्त्री शक्ति स्वरूपा जगदंबा


...नव रात। नव विलास। नवरात्रि।

भगवती जगदंबा का पर्व। शक्ति स्वरूपा देवी मां का प्राकट्य उत्सव। जगत जननी की आराधना का त्योहार। एक नहीं, नौ दिन। नौ रात। घर-घर घट स्थापना। गली-गली देवी प्रतिमा स्थापना। रास विलास। रास उल्लास। गरबा। नृत्य के संग देवी आराधना-पूजन-अर्चन का अनूठा पर्व। समाज में शक्ति जागरण का पर्व। स्त्री शक्ति की महत्ता को प्रतिपादित करता उत्सव। अनादिकाल से अनंतकाल तक। अनवरत समाज शक्ति की साधना में निमग्न है। बगैर शक्ति...शिव भी अधूरे हैं। समूचे ब्रह्मांड का संतुलन शक्ति बिना असंभव है। अन्यथा सृष्टि में ब्रह्मा-विष्णु-महेश के रहते भी शक्ति की आवश्यकता क्यों हुई। सृजन-पालन-विसर्जन की व्यवस्था होने के बाद भी संसार शक्ति के बगैर अधूरा ही रहा। सर्व शक्तिमान त्रिदेव के अस्तित्व में होने के बावजूद आसुरी शक्तियों का नाश बगैर शक्ति के नहीं हो पाया। त्रिदेव की देह से निकले शक्ति पुंज से प्राकट्य हुई देवी शक्ति ही आसुरी ताकतों का विध्वंस कर पाईं, जिनसे देव पस्त हुए, उन्हें देवी ने परास्त कर दिया। हर युग में ये ही हुआ। सतयुग से त्रेता और द्वापर तक। दानवों का दमन भगवती के हाथों ही हुआ।


...फिर ऐसा क्या हुआ कलियुग में कि नारी शक्ति, आसुरी ताकतों का अंत करने के बजाय उसका शिकार हो रही है? जिस शक्ति ने राक्षसों का अंत कर दिया, उसी शक्ति स्वरूपा नारी का इस धरा पर इतना अपमान.. इतना मान मर्दन क्यों? अबोध बालिका से लेकर बूढ़ी अम्मा तक आज सुरक्षित नहीं। शीलहरण, व्यभिचार, प्रताड़ना का शिकार क्यों? अपने सतीत्व और स्त्रीत्व की रक्षा करती मातृशक्ति इतनी लाचार क्यों? सबला नारी...अबला क्यों? ये लाचारी किसने ओढ़ाई? या स्वयं ओढ़ ली? इतिहास के किस कालखंड को दोष दें? इस लाचारी और बेबसी का कौन है जिम्मेदार?


...तो है मातृशक्ति। आपने फिर ये लाचारी का भाव क्यों ओढ़ लिया? पुरुष समाज से परबसता आखिर कब तक? जागृत करो फिर से अपना शक्ति भाव। देवी भाव। संहारक क्षमता। भरो हुंकार। आताताइयों, बलात्कारियों के खिलाफ करो शंखनाद। खड्ग-ढाल का इंतजार मत करो। नेत्रों में ज्वाला भरो। नथुनों में फुफकार। मुट्ठियों को भींच लो। जबड़े कस लो। ये पद्मनियों के जोहर की धरा है। रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य की भूमि है। तो अब स्वयं उठो। प्रतीक्षा मत करो न्याय की, जो अन्याय से कम नहीं। जो स्त्रीत्व का हरण करे... उसका कालरात्रि बनकर संहार करें। नारी जाति पर हो रहे अन्याय-अत्याचार का अंत शक्ति जागरण के बगैर संभव नहीं। समाज में भी ऐसी लोकचेतना जागे जो हर कन्या, हर युवती-हर स्त्री में भगवती स्वरूप देखे। वैसी ही दृष्टि विकसित हो।


तो है मातृशक्ति। जगाइए अपने देवित्व को। साधे अपने ओज तेज को। करें साधना शक्ति की, शक्ति आराधना के इस पर्व पर…ताकि कोई आपकी तरफ कुदृष्टि न डाल सके...!!


भगवती...सुस्वागतम...!!


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